Monday, 7 December 2015

कविता: सड़क 3



सड़क पर शांति है आज
न पों-पूं, न धां-धूं और न ही टी-टों
न बड़ी-बड़ी गाड़ियां, न कोई पोहे वाला और न ही बिकने को खड़े प्रवासी

इतवार है इसलिए सब छुट्‌टी पर हैं शायद
पर इक्की-दुक्की मोटरसाइकल हैं, उन पे जा रहे कुछ कपल
ये जोड़े बैठे हैं ऐसे मानो सड़क की शांति को खुद में समा लेना चाहते हों
बिना फ़िक्र के कि हर चौराहे पर लगी हैं तीसरी आंख
जो घूरती है हर प्यार करने वाले को, कंट्रोल रूम में बैठे इंसानी चश्मे से

फिर भीवो जा रहे हैं एक-दूसरे में िलपटे सड़क की शांति को खुद में लिपटाते हुए
बेफ़िक्र, बेखौफ़ बस आवाज है पीछे छूटती हुई मोटरसाइकल की
न पों-पूं, न धां-धूं और न ही टी-टों

Saturday, 5 December 2015

कविता: सड़क 2



सड़क पर फिर किसी रोज वैसे ही चल रही थी गाड़ियां
पों-पूं धां-धूं, टी-टों

फिर वही सिग्नल, वही बड़ी-बड़ी गाड़ियां
वही पोहे वाला और सेडान और बिकने को खड़े प्रवासी

फिर आगे का सफर
मरम्मत के दम पर चलता फ्लाईओवर
पुल पर ही लम्बी लगी वाहनों की कतारें

राजस्थानी कलाकृतियों के अवशेषों से सजे
टूटे पुल पर रेंगती गाड़ियां
अपने आशिक को धूप से बचाती घूंघट में खड़ी औरत की कलाकृति
उसकी छांव तले चिथड़ों में लिपटी हुई पड़ी है कोई जिंदा लाश
उसके बगल से वैसे ही गुजर रही हैं गाड़ियां
पों-पूं धां-धूं, टी-टों.

कविता: सड़क



सड़क पे धुआं फेंकती गाड़ियां
पों-पूं धां-धूं, टी-टों

बगल में खड़ा नहीं हो सकता क्या?
कहते हुए पीक देना पिच्च

खड़े सिपाही की टोपी को देखकर
सिग्नल तोड़ते बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बैठे ‘छोटे-छोटे’ लोग

फुटपाथ पे खड़ा पोहे वाला, चौराहे पर सेडान में बैठे सेठ और बिकने को खड़े प्रवासी
बस 250 ही तो ले रहा हूं साब, नहीं 200 दूंगा, ठीक साब चलो
फिर चल दिया वो उसके साथ जैसे सड़क पे चल रही हैं गाड़ियां
पों-पूं धां-धूं, टी-टों

Sunday, 22 November 2015

मुझे ब्लड कैंसर है तो क्या मैं अछूत हो गया हूं...???



किसी छोटे से बच्चे को आपकी कही कोई बात ऐसी चुभ जाती है जो उसे बेचैन कर देती है। वो सोचता रहता है कि मेरे आसपास का समाज ऐसा क्यों है? 12 साल का कार्तिक क्यों मुझसे कहता है कि यहां लोग अच्छे नहीं हैं? जबकि उसे इस वक्त सबसे ज्यादा हमदर्दी की जरूरत है। 

अजमेर के कार्तिक को ब्लड कैंसर है। एक दिन ऐसे ही अस्पताल के पास मैं अपने साथी गौतम के साथ उससे मिल गया। सभी की तरह हम भी  उसकी बीमारी देख कर थोड़ी सी देर भावुक हुए और वापस ऑफिस आकर काम में मशगूल हो गए। कई दिन निकल गए। हम भी सब की तरह कार्तिक को भूल गए लेकिन वो बच्चा अस्पताल की बेंच और अपने बैड के बीच की दूरी में चलते हुए बहुत कुछ अनुभव कर रहा था। कई दिन बाद गौतम जी को कार्तिक फिर से मिल गया। उनके बीच क्या बात हुई, मैं नहीं जानता लेकिन ऑफिस लौट कर गौतम जी ने कहा कि कार्तिक ने मुझे याद किया है और वो कैंसर मरीजों के लिए एक लेख लिखना चाहता है। शुरूआत में थोड़ी झिझक हुई कि क्या मेरा अखबार में इसके लिए सपोर्ट करेगा, संशय में हमारे संपादक साहब के पास पहुंचा और कार्तिक के बारे में बताया। उन्होंने तुरंत हां कर दी।


अगले दिन ही मैं उस अस्पताल में पहुंच गया। थोड़ी देर बात हुई और फिर वो सुबक-सुबक कर रोने लगा। कुछ ऐसा कि मैं भी अपने तीन साल के करियर में इमोशनल हो गया। मैं नहीं जानता कि कार्तिक की कही बात को अपने शब्दों से कितना आपको समझा पाया हूं, पाया भी हूं या नहीं? पर ये चिंता तो है ही कि हमारा समाज इतना संवेदनहीन कैसे होता जा रहा है? जो एक बच्चे को भी नहीं बख्श रहा। अरे! कार्तिक को ब्लड कैंसर ही तो है, इससे वो अछूत तो नहीं हो गया। क्यों आप अपने बच्चों को उससे बात करने से रोकते हैं ये कहकर कि इससे बात मत करो ये बीमार है। जबकि कार्तिक जब भी किसी से मिलता है मुंह पर मास्क लगा लेता है। खून के लिए दर-ब-दर भटकते उसने अपने परिवार वालों को देखा है, अस्पताल में अपने से गरीब लोगों को खाने के लिए तरसते हुए देखा है। जब उसने पूछा कि एक कतरा खून मिलना इतना मुश्किल क्यों है तो हम सब लाजवाब हो गए उसके इस सवाल पर। सरकार कुछ करती क्यों नहीं इन लाखों बच्चों के लिए जो कैंसर से लड़ रहे हैं? अमीर-गरीब का इतना भेद क्यों है हमारे समाज में? कोई अमीर आदमी किसी गरीब की मदद क्यों नहीं करता? मैं जब बड़ा होकर कॉन्ट्रेक्टर बन जाऊंगा तो इन सब गरीबों की मदद किया करूंगा। इतना कहते ही कार्तिक फूट-फूट कर रोने लगा, ऑडियो रिकॉर्ड करने की मेरी और हिम्मत न हो सकी।

75 साल के उसके दादा भी अपनी झुर्रियों में आंसूओं को छुपाते हुए उसके बचपन को हमारे लिए खोल रहे थे कि किस तरह वो सबसे तेज दौड़ता था, हमेशा 98% से ज्यादा मार्क्स कार्तिक लेकर आता है। बोलते हुए हथेली से आंसू भी पोंछ रहे थे। समझ नहीं आ रहा था वहां कुछ, सबकुछ बिलकुल सन्नाटा जैसा महसूस हो रहा था। मैंने वहां से निकलने की सोची कि शायद इससे इनका रोना बंद हो जाए, हो भी गया। कार्तिक के बहुत से फोटो लिए और ऑफिस आ गया। आ तो गया लेकिन उस बच्चे के सवाल दिल को कचोट रहे हैं, ऐसा समाज बनाने में हमारी कितनी भूमिका है और कितनी भूमिका हमारी राजनीति की? क्यों एक बच्चे को अपनी बीमारी से ज्यादा इस समाज की सोच से लड़ना पड़ रहा है? बस ज़रा सोचिए!

बाकी तो हम सब अपनी मर्जी का करते ही हैं...



कभी-कभी हम वो सब देखते हैं जो जिंदगी में अपने साथ होता हुआ नहीं देखना चाहते। क्यों हम वो समझ नहीं पाते जो हमें बचपन से समझाया जाता रहा है और सही भी है। जो आप कर रहे हैं वो शायद इसलिए आपके लिए गलत ना हो क्योंकि करोड़ों लोग उसी काम को कर रहे होते हैं लेकिन जो गलत है वो गलत हैं चाहे पूरी दुनिया उसी काम को कर रही हो, सही और फैशन मान कर। 

शुरूआत शायद यहीं से होती है रिश्तों के दरकने की, वक्त है संभलने का हो सके तो प्लीज! मैं वो सब नहीं देख पाया, गुस्सा था, अफसोस और अजीब किस्म की दया भी। सिवाय बर्बादी के और कुछ नहीं हो सकता उस रास्ते पर, जहां पर हम कभी निकल जाते हैं बिना सोचे-समझे कोई तर्क और कोई सफाई उस वक्त आपको किसी के सामने खड़ा नहीं कर पाएगी। 

अपने वजूद को पहचानिए और थोड़ा देखिए अपने गुजरे हुए कल की तरफ और फिर सामने देखिए उस रास्ते को जिसे आप संकरा कर रहे हैं अपने लिए और अपने बचे-खुचे सूत से रिश्तों के लिए। बस जो था यही है बाकी तो हम सब अपनी मर्जी का करते ही हैं।

Sunday, 11 October 2015

तुम्हारी ट्रैजडी क्या है पॉलिटिक्स?


कभी-कभी लगता है राजनीति अच्छी चीज होने के बावजूद सब बर्बाद करने पर तुली हुई है। सब बोर करने लग जाता है। ये भाषण, अखबार, टीवी, रेडियो और वे दुनियावी लोग जिनका सारे संसाधनों पर कब्जा है। वही दिल्ली के आस-पास रची गई खबरें और उन पर बेमतलब की घंटों बहस करते चतुर नेता और हम पत्रकार। लगता है किसी चीज का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। लेकिन फिर भी मन को लगता है एक दिन सब सुधर जाएगा। सड़कों पर बिखरा हुआ आदमी ही इन उम्मीद को हवा देता है। वो हवा सदियों पुरानी होने के बावजूद एकदम ताजी सी लगती है। एक ऐसी ही हवा पिछले दिनों मैंने महसूस की, ठीक उसी वक्त जब हम दादरी और बीफ पर बहस कर रहे थे। एक मुस्लिम लड़के के कुएं में उतरकर गाय को बचाने को बहुत बड़ी बात कह रहे थे जबकि ऐसा हमारे गली-मोहल्लों में रोजाना होता है। हमारे अवचेतन में उस वक्त न हिंदू होता है ना मुसलमां।

सलीम मियां हमारा आटा पीस देगा का, को सलीम मियां अपनी जुबान की नकल करना नहीं मानते और न ही उस बात का बुरा मानते हैं, बस हमेेशा क्यों नईं पीसंगे पंडित जी कह कर हंस देते हैं। मेरे दोस्त फिरोज के बाबा मुश्तु घर के आगे से जब भी निकलते हैं, मास्टर राम-राम कहते हैं (पापा अध्यापक हैं) और पापा जानबूझकर मुश्तु बाबा को सलाम कहते हैं। बकरियों के पीछे-पीछे चलते हुए मुश्तु बाबा कभी-कभार कह जाते हैं, मास्टर एक गाय बांध लै, दूध है जागौ घर में बच्चन के काजें।
ये एक-दूसरे के लिए अदब ही है कि घर में पुट्टी करते मुल्ला जी घर की एक दीवार पर बने लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती की पेटिंग को ढंकने के लिए बोलते हैं, टेप से चिपकवाने में भी मदद करते हैं। क्या है न पंडित जी, दिवाली आ रही है तो इनकी पूजा होगी, पुट्टी में ये दब जाएंगे इसीलिए इन पर अखबार लगा देते हैं।
जयपुर के मोती डूंगरी रोड पर मुसाफिरखाना है। शुक्रवार को घंटेभर के लिए वहां गया था। जुमे की नमाज पढ़ कर एक बुजुर्ग उसी चाय की दुकान पर आ गए जहां मैं बैठा था। एक जनाब इनसे मजे ले रहे थे। 82 साल के पहलवान खां से मैंने यूं ही बोल दिया, आप अभी इतने स्मार्ट हैं तो जवानी में कितने सुंदर रहे होंगे। वो हंस दिए, बोले, अभी भी हूं,कोई शक है क्या? नहीं, नहीं बिलकुल नहीं। मेरे कान के पास आकर बोले, मैं आर्मी का आदमी रहा हूं। हिंदुस्तान के लिए आज भी जान दे सकता हूं, आधी रात को भी। अभी भी फौज के लोगों से मेरे ताल्लुकात हैं और ये बेवकूफ मेरे मजे ले रहा है।

इसीलिए कहता हूं हमारे खून में हिंदू-मुसलमान नहीं है। मुझे एक मुसलमान लड़के का कुएं में उतरकर गाय को बचाना कोई हैरतभरा नहीं लगा। दुनिया में जो भी इंसान है और इंसानियत को मानता है उनका सोचने का तरीका एक ही है, वो जब भी कुछ गलत होते हुए देखता है, बचाने की ही कोशिश करता है। जो नहीं करता वो इसी तरह की राजनीति का शिकार है। राजनीति चतुर है और उसके शिकार लोग मूर्ख। इसलिए गाय और बीफ चतुर लोगों का मूर्ख पर राज करने का तरीका भर है बस और जो इस बात को समझ  रहे हैं वो ही अगली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करेंगे।