Thursday, 30 April 2015

त्रासदी की कहानी, स्थानीय पत्रकार की जुबानी

हर रोज की तरह मैं अपने साथियों के साथ विश्व दर्शन अभियान के ऑफिस में बातचीत कर रहा था, तभी जोरदार झटका लगा। बाहर आकर देखा तो मंजर अलग ही था, वो सब उजड़ चुका था जिसे कुछ देर पहले ही मैं निहार कर अंदर घुसा था। बर्बादी का ऐसा मंजर आंखों के सामने था जिसकी कल्पना भी संभव नहीं, लेकिन वो घटित हो चुका था। माहौल इतना डरावना कि सब स्तब्ध।

बदहवास से लोग खुले आसमान की तरफ भाग रहे थे। सिर से निकलते खून पर हाथ रखकर मैं भी भागा और एक खुली जगह पर सैंकड़ों लोगों के साथ खड़ा हो गया। लगातार आ रहे आफ्टर शॉक हमें हिला रहे थे, हम हिल रहे थे, बाहर से भी और अंदर से भी।

चारों तरफ चीत्कार और क्रंदन की आवाजें ही सुनाई दे रही थींं। फिर एक अजीब से सन्नाटे में सुन पा रहे थे तो सिर्फ सायरनों की आवाजें। शाम होते-होते भूकंप की गंभीरता का अंदाजा हुआ। रात 12 बजे तक वहीं कहीं खुली जगह में बैठे रहे। हिलती-डोलती धरती के बीच ही सुबह हुई। उस हादसे का भयानक मंजर अगली सुबह दिख रहा था। सब कुछ मिट्टी में मिला हुआ।

अस्पतालों के बाहर लाशें और अपनों को ढ़ूढ़ते कराहते हुए लोग। हमारा गर्व धरहरा पता नहीं कितनी जान अपने आगोश में लिए जमींदोज हुआ पड़ा था। दहशत से भरे हुए सैंकड़ों लोग इसी धरहरा के पास खाली पड़ी जमीन पर शरण लिए हुए थे। दूसरे दिन भी मैं और हमारे साथी काठमांडू के शांतिनगर और धरहरा के पास इसी खाली जमीन पर रहे। यहां लोगों में दहशत इस कदर बैठ गई है कि जिनके मकान सुरक्षित भी हैं वो अंदर नहीं जा रहे। मंगलवार तक चार दिन हो गए लेकिन जमीन अभी भी हिल रही है। सोमवार रात 9.30 बजे ही झांपा में 4.0 रियेक्टर के झटके महसूस किए गए। नेपाल के 75 जिलों में से 27 बुरी तरह इस जलजले से प्रभावित हुए हैं। लेकिन इस मुश्किल घड़ी में जिस तरह से भारत सरकार और इंडिया के लोग हमारे साथ खड़े हुए हैं, उसके लिए उनका तहेदिल से शुक्रिया।

जैसा कि फैडरेशन ऑफ नेपाली जर्नलिस्ट के सदस्य नारायण भट्टराई ने बताया।

Sunday, 29 March 2015

पार्क की बातें...

जयपुर में मानसरोवर के इस रोज़ गार्डन को हर किसी ने अपने हिसाब से बांटा हुआ है। एंट्री गेट पर ही देश की सारी समस्याओं की चिंता 60+ क्लब के लोग करते हुए पाए जाते हैं। मनरेगा से लेकर विदेश नीति तक संभाल लेते हैं हमारे बुजुर्ग। अभी 'आप' की सारी समस्याएं बेंच पर बैठे-बैठे सॉल्व कर रहे हैं।

 ठीक इनके पीछे 50+ की आंटियां बैठी हुई हैं। इनमें से एक के बेटे की सिंगापुर में नौकरी लगी है जबकि दूसरी का बेटा दिल्ली में ही रह गया। तीसरी आंटी किस्मतवाद में भरोसा करती हैं, जो कह रही हैं हमारे की किस्मत में होगा तो कहीं लग जायेगा।

 थोड़ा आगे बढ़ आईये तो इन भाइयों को बैडमिंटन खेलते इतना पसीना आ गया है कि सिर्फ बनियान में खेल रहे हैं तरबतर। पार्क में क्रिकेट खेलना मना है तो क्या हुआ हम बच्चे टेनिस बॉल से कैच-कैच खेल लेंगे। ओह! इसके हाथ में तो बॉल भी नहीं फिर भी दूर से दौड़ कर आ रहा है और बॉल फेंकने की प्रैक्टिस कर रहा है।

पार्क की सारी बेंच खाली हैं क्योंकि शहर में किसी को घास नहीं मिलती बैठने को लेकिन ये लड़का है जो हाईमास्ट लाइट के नीचे बिछी बेंच पर बैठ कर पढ़ रहा है। शायद! कोई एग्जाम है लेकिन रूम में इतनी गर्मी है कि वहां टिका ही नहीं जा रहा, इसलिए पार्क में आकर पढ़ रहा है।

 टहल रहा हूं तभी गुलाबों के पौधों के बीच से आवाज आई, यहां से कहीं और बैठते हैं खुले में,मच्छर बहुत काट रहे हैं यहां। मुझे नहीं पता, इनका क्या रिश्ता है लेकिन जिस तरह से बैठे हैं, मैं भी वही समझ रहा हूं जो हमारा समाज समझता है। ओह! इस मोटी सी लड़की ने कानों में इयर फोन लगा कर कितने चक्कर लगा दिए इतनी सी देर में।

अच्छा तो फैमिलीज़ के बैठने का अलग सेक्शन है। सब लोग कुछ चर्चा में मशगूल हैं हाथ में एक-एक कोन पकड़े। वैसे हर पार्क के बगल में हर जगह मंदिर क्यों होता है, वो भी एग्जिट गेट के आसपास? शायद इसलिए कि पार्क से जाते हुए लोग धोक लगाते हुए निकल जाएं,एक्स्ट्रा बेनिफिट्स हो तो ठीक।

खैर! दो चक्कर मेरे भी पूरे हुए। जहां बैठा हूं उसी जगह कमाल का सामाजिक बदलाव होते हुए महसूस कर रहा हूं, एक अंकल किसी लड़की से पूछ रहे हैं (शायद बाप-बेटी हैं) लड़का पसंद नहीं हो तो बता दे। कुछ देर शांति रही फिर बोली, हाईट कम है।

मेरा मेरी करणेंद्रिय पर काबू नहीं है इसलिए जहां से गुजर रहा हूं कुछ ना कुछ सुनकर निकल रहा हूं। आप ये मत कहना कि किसी की प्राइवेट बातों को सुनने का मुझे कोई हक़ नहीं है, नहीं तो मैं जबाव दूंगा कि पब्लिक प्लेस पर कोई प्राइवेट कैसे रह सकता है?

भैया का फ़ोन आ गया, खाना पैक करवा ला (दो दिन से सिलेंडर ख़त्म जो है) इसलिए निकलने लगा हूं लेकिन ये लड़के गुलाबजामुन की  बात पर इतना क्यों हंस रहे हैं?? और ये भाई खुद भागने का अहसास टेम्पल रन में भागकर कर रहा है और इन जवान लड़कों के लिए धर्म भूखे को खाना खिलाना है, पूजा-पाठ नहीं।

देखो तो बाज़ार को जहां कुछ लोग दिखे वहीँ आ जाता है। गेट पर लौकी, करेले, चुकंदर  और पालक का ज्यूस बिलकुल प्राकृतिक। राजा जी आइसक्रीम और मेरठ की पतासी एकदम शुद्ध और साफ़ पानी से बनाई हुई।अरे! इतनी गाड़ियां? अच्छा सब लोग घूमने के लिए कार और बाइक से आये हैं। अब चला जाए...खाना पैक करवाना है।

Thursday, 26 March 2015

लाखों-करोड़ों अनुष्काएं हैं, जिनका कोई विराट नहीं

कोहली क्या अकेला घं... कर लेता यार! और धोनी अपनी पूरी पारी ढंग से खेलकर गया। 65 में 65, एक भी बॉल खराब नहीं की। रोहित तो खेला ही नहीं, रैना भी नहीं खेला मतलब कोई भी नहीं खेला जैसा सब खेलते हैं। भैन...द जब वर्ल्डकप शुरू हो रहा था तब तो सारी तोपें कह रही थी टीम बड़ी कच्ची है, ज्यादा आगे नहीं पहुंच पाएगी। अब सेमीफाइनल से लौट रही है तो बम्बू हो रहा है। और बेचारीअनुष्का की वैसे ही ले ली यार! यार कुछ भी है हमारा देश है तो चू...यों का देश


रात के 11.30 बजे घर के पास बने खूबसूरत से रोज गार्डन में टहलते हुए 4-5 लड़कों की बातचीत है ये। जैसे बातें कर रहे थे, लगा इंजीनियरिंग के स्टूडेंट हैं। बातचीत के तरीकों से साफ लग रहा था ये इंटरनेट पर ही रहते होंगे और टीवी कम ही देखते होंगे। देखते भी होंगे तो मैं यकीन से कह रहा हूं न्यूज़ चैनल नहीं देखते होंगे। वो समाचारों के लिए शाम को अखबारों की वेबसाइट्स देखते हैं, ऐसा एक ने बताया। टीवी नहीं देखते तभी उनकी बातों में ईमानदारी और अनुष्का के लिए हमदर्दी थी।


मतलब मैं ये राय बना रहा हूं कि जोक उन्होंने ही बनाए जो टीवी देखते हैं। क्योंकि मज़ाक मैंने उन्हीं को बनाते हुए ज्यादा देखा जो सोशल और मेनस्ट्रीम मीडिया में हैं या दिलचस्पी रखते हैं। मेरी मां ने भी शाम को फोन पर मुझे अनुष्का-विराट पर बना एक चुटकुला सुनाया, जबकि वो इंटरनेट नहीं चलातीं, घर में रेडियो भी नहीं है सिर्फ टीवी है और ज्यादातर समय अकेली रहती हैं। 

मतलब चैनल (न्यूज़ वेबसाइट्स भी) जनमानस में राय बनाता है और किसी चीज को इतना बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता है कि सभी को उसी नज़रिए से दिखने लगता है। इसमें मीडिया में काम करने वाले भी सब कुछ जानते हुए शामिल हो जाते हैं। साथ ही (न्यूज़ चैनल और अखबारों) की वेबसाइट्स खासकर हिंदी की साइट्स इलेक्ट्रोनिक मीडिया के 2005 वाले दौर में हैं। खबर और साइट दोनों को चलाने के लिए (जिसे हम बेचना भी कहते हैं) जहां सांप-बिच्छु वाली खबरों की तरह अनुष्का और विराट को बेचा गया। मैच हारने की स्थिति में पहुंचे तो उन खबरों की प्राइआरिटी घटा-बढ़ा दी जो सुबह भारत की जीत की भविष्यवाणियां कर रही थीं, ताकि वो साइट में अंदर दब जाएं।


अब रही बात अनुष्का शर्मा को लेकर बनी मज़ाक की तो इसमें मुझे कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि जब ऑफिस से घर लौट रहा था तब शेखावाटी के दो लड़के एक लड़की पर कमेंट कर रहे थे। लड़की की ख़ता ये थी कि वो वाट्सएप पर किसी से चैट कर रही थी, इसी दौरान उसका स्टैंड आ गया और वो हड़बड़ी में ही पीछे के दरवाजे से उतरने लगी। कंडक्टर ने मना कर दिया तो उसे अगले स्टैंड तक इंतजार करना पड़ा। इतनी देर में चैटिंग को लेकर दोनों ने जो कमेंट किए, लिख नहीं सकता। मैंने इतना ही कहा कि यार आप इसके वाट्सएप पर चैटिंग को ही देख रहे थे क्या? मुझे मारने पर उतारू हो गए, वो दो थे और मैं दुबला सा अकेला बाकी सब हंसने वाले। इसलिए चुप हो गया। इसलिए देश में लाखों-करोड़ों अनुष्काएं हैं, जिनका कोई विराट नहीं। हां, उस मज़ाक में कुछ देर के लिए मैं भी शामिल हुआ था, भले ही कुछ लिखा ना हो पर लिखे हुए को एक-दो जगह शेयर किया था वाट्सएप पर इसलिए अनुष्का से माफी मांगता हूं।

Saturday, 21 March 2015

बिरयानी तो झूठ था...

तो कसाब ने कभी जेल में बंद रहते न बिरयानी खाई और न ही उसने इसकी कभी डिमांड रखी थी। बिरयानी वाली बात तो देश में कसाब के प्रति बन रही सहानुभूति को रोकने के लिए मैंने मीडिया के आगे यूं ही कह दी और यह बड़ी खबर बनी। यहां तक कि उस समय के विपक्ष के नेता देवेन्द्र फड़नबीस ने भी इस बात की जांच के लिए जेल का दौरा किया था। कसाब नाटक भी करता था। जैसा उसने रक्षाबंधन वाले दिन कोर्ट में रो कर किया।  उसने मुझसे पूछा कि 'बादशाह तेरे हाथ में ये लाल धागा काहे को बंधा है'?


ये सारी बातें शुक्रवार को  सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने जयपुर में कही थीं। हालांकि मुझे इस बात पर ज़रा भी आश्चर्य नहीं हुआ कि उसने कभी बिरयानी मांगी भी या नहीं। शुरू से इस बात में कभी दिलचस्पी भी नहीं थी कि वो क्या खाता है और क्या पीता होगा। लेकिन अब सबके सामने आ गया कि यह महज़ झूठी और जाूनबूझकर फैलाई गई जानकारी थी। यह झूठ राष्ट्रीय खबर बनी औऱ कई राजनेताओं ने इसे अपने भाषणों में शामिल भी किया खासकर भाजपा ने। खुद मोदी ने भी इस झूठ को अपने चुनावी भाषणों में इसे आतंक के विरुद्ध इस्तेमाल किया।


तो पहली बात ये कि निकम ने इसे अब सार्वजनिक क्यों किया? निकम कसाब को फांसी होने के बाद भी ये तुरंत बता सकते थे लेकिन उन्होंने एेसा नहीं किया।


दूसरा, देश का राष्ट्रीय मीडिया। निकम के अनुसार यह बात  मीडिया को काल्पनिक बातों में उलझाने की रणनीति का हिस्सा थीं। क्योंकि मीडिया में कसाब के लिए सहानुभूति पैदा करने वाली खबरें चलाई थीं और उसे बच्चा साबित किया जा रहा था। कोर्ट में उसके आंसू पोंछने के नाटक को मीडिया ने दिखाया कि बहन की याद में कसाब कोर्ट में रोने लगा। खैर! ये एक आतंकवादी से जुड़ा झूठ है इसलिए सरकार भी इसे देशहित में सही कह देगी और जनता जनार्दन का कुछ हिस्सा भी।


लेकिन इससे ये भी साफ हो गया कि  हमारे मीडिया में कोई भी बात कितनी आसानी से प्लांट कराई जा सकती है और बड़े-बड़े धुरंधर पत्रकार कितनी आसानी से उन पर यकीन कर एक झूठ को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना देते हैं। कितनी स्टोरी मीडिया में प्लांट करवाई जाती होंगी सिर्फ  झूठ पर? हम जब पत्रकारिता 'पढ़' रहे थे तब यह बताया गया कि किसी की बात को ज्यों का त्यों नहीं दिखाया या छापा जाना चाहिए। पहले उसकी पूरी जांच-पड़ताल की जानी चाहिए। लेकिन यहां  कुछ नहीं हुआ।


निकम की इस बात से साफ हो गया कि हम जो भी देख-पढ़ रहे हैं वो मिलावटी तो है। इतना ही नहीं मिलावट का प्रतिशत ना तो अखबार का संपादक  जानता है औऱ न ही वो टीवी चैनल जो इस मिलावट भरी खबर पर प्राइम टाइम कर रहा है। मतलब पूरा मामला एकतरफा है।


प्रख्यात पत्रकार जॉन पिल्गर ने इस पर शिकागो में एक व्याख्यान में मीडिया में प्रोपेगेंडा, बिकी हुई खबरों पर लंबा भाषण दिया था। उसमें बताया था कि अमेरिका के अखबार के एक झूठ ने किस तरह से इराक में युद्ध करवा दिया और वहां के हालात सबके सामने हैं। (लेख को आप यहां पढ़ सकते हैं।--http://hashiya.blogspot.in/2010/02/blog-post_15.html)


 इसलिए आप वही पढ़िए जो आपके काम का है। अपनी जानकारी लेने के माध्यमों को आप एक या दो तक सीमित मत रखिए। मीडिया में जो भी दिखाया और लिखा जा रहा है हो सकता है वो पूरा सच ना हो। इसलिए बी अवेयर!

Wednesday, 4 March 2015

इसलिए मेरे ब्लॉग का नाम 'मेरी बाख़र' है...

एक शब्द आपको भूत में ले जाकर उस पूरे समय की यात्रा कराने की बहुत बड़ी ताकत अपने पास रखता है। ठीक उसी तरह जैसे बाख़र शब्द ने मुझे करा दी। कई दिनों से एक अच्छे शब्द की तलाश में था जिसे अपने ब्लॉग का नाम दे सकूं लेकिन सोचने से कहां शब्द आते हैं ये तो अचानक ही आपकी स्मृति में आते हैं और अपने साथ लेकर चले जाते हैं। दरअसल, इस शब्द को मैंने जीया नहीं लेकिन इसमें पूरी एक संस्कृति बसी हुई है। इंसान को इंसान के साथ रखने की हमारे बुजुर्गों की चतुराई भरी रचना है ये बाख़र शब्द। हो सकता है अलग-अलग इलाकों में इसका नाम अलग-अलग हो लेकिन देश के हर इलाके में चलता जरूर है।

बाख़र का मतलब सीधे समझें तो घर होता है, लेकिन मैं इसे दूसरे तरीके से समझने की कोशिश करता हूं कि आखिर इस शब्द को क्यों जन्म दिया गया होगा और इस शब्द को गढ़ने के पीछे वो कौनसे विचार थे?

खैर! हमारा जन्म तो ईंट-पत्थरों के बने पक्के घरों में हुआ लेकिन पिताजी तक की पीढ़ी कच्चे घरों में ही जन्मी। गोबर से लिपी दीवारें और छत पत्थर के बड़े-बड़े चौकों से बनी जिनका दोनों और ढलान होती थी। जिन्हें पाटौर कहते हैं। काफी एरिया में फैले इन घरों की खासियत थी कि इनमें कोई एक परिवार नहीं रहता था। रहते थे सारे खानदान के लोग। एक बाख़र मतलब बड़े-बड़े 8-10 कच्चे कमरे। जिसमें कम से कम 4-5 परिवार। मतलब एक परिवार के पास 2 कमरे। लेकिन ये वैसे ही रहते थे जैसे आजकल फिल्मों में भारत-पाकिस्तान के अलग होने से पहले हिन्दु-मुसलमानों के प्यार से रहने को दिखाया जाता है। चौकोर या गोलाई में बने कमरों के बीचों-बीच बड़ा सा आंगन जिसमें हर परिवार के अपने कमरे के आगे चूल्हे रखे होते थे। हर परिवार 5 तरह की सब्जियों से खाना खाता था। एक परिवार में एक ही सब्जी बनने के बावजूद। खुले में किचन होने का फायदा शायद यह होता होगा कि घर की औरतें खाना बनाते-बनाते गप्पें भी मार लिया करती होंगी।

 शाम की महफिल इन बाख़रों के आगे बने चबूतरों पर सजा करती थी। मैं उन बच्चों में से था जिनका परिवार इन बाख़रों से निकलकर पक्के घरों में बस चुका था लेकिन बाख़र वालों के ठीक सामने ही। इस तरह हम पक्के मकानों की छतों से उन चबूतरों पर सजी महफिलों को देखा करते थे। सर्दियों में अलाव पर बैठ कर बुजुर्गों की देश के लिए चिंताएं, राजनीति से नाउम्मीदगी और फिर लौट-फिर कर अपने खेतों पर लौट आना धुंधला-धुंधला सा याद है।
फिर सब बाख़र में बने कमरों की ओर लौट जाते।

कुलमिलाकर बाख़र एक ऐसी जगह हुआ करती थी जहां अलग-अलग विचारों के बावजूद सब लोग प्यार से एक साथ रहते थे। लेकिन एक दिन एेसा आया जब सबके पक्के घर बन चुके थे, सब उनमें से निकलकर अपने पैसे का प्रदर्शन करने लगे और उन खाली पड़ी बाख़रों के खंडहर बन चुके कमरों के पीछे उन लोगों की संतानें आपस में लड़ने लगीं। लड़ाई इसलिए हुई क्योंकि बुजुर्गों ने यह सोचकर उन्हें नहीं बनाया कि कल अगर लड़ाई-झगड़े भी हुए तो रास्ते भी अलग-अलग होने चाहिए।
उन बुजुर्गों की संतानें उन खंडहर में भी हिस्सा लेने पहुंच गई हैं। लड़ाइयां रुक नहीं रहीं क्योंकि एक बाख़र के अब मालिक कई हैं औऱ रास्ता सिर्फ एक। वो आंगन में रखे वो टूटे हुए चूल्हे उन लड़ाइयों के गवाह बन रहे हैं।

 बाख़र से निकलकर पक्के घरों में पहुंचे लोग अब एक ही खानदान के होने के बावजूद एक-दूसरे से बात नहीं करते, शादी-ब्याह में आना-जाना नहीं है। अब हर घर में अलग अलाव जलता है और वो एक ही सब्जी से खाना खाते हैं। लेकिन मेरा मन करता है कि वो एक ही अलाव फिर से जले, एक सब्जी बनने के बाद भी मैं 5 सब्जियों से खाना खाऊं। शायद उस हकीकत में पहुंचना अब असंभव है तो मैंने सोचा क्यों ना एक बाख़र यहां बसा ली जाए। प्रग्रेसिव होते हुए भी हम पहले जैसे रहें, बाख़र वालों की तरह। कम से कम फीलगुड तो रहेगा। 'मेरी बाख़र' एेसी हो जहां सिर्फ प्यार हो, प्यार का अलाव हो और वही अलाव वाली प्यारी-प्यारी बातें और बहसें। 

Wednesday, 25 February 2015

मैंं इश्क में शहर नहीं हो सकता...

देखो आजकल सब इश्क़मय हो रहे हैं। क्यों ना हम भी इश्क़मय हो जाएं। लेकिन...लेकिन मैं कैसे इश्क़ में हो सकता हूं। सब शहर में इश्क़ करके इश्क़ में शहर हो रहे हैं। मैं तो गांव का हूं।  तो क्या हुआ? क्या तुम मेरे इश्क़ में शहर नहीं हो सकते? नहीं। सब तो हो रहे हैं। मैं नहीं हो सकता। हां सरसों के खेत में बैठकर इश्क़ कर सकते हैं। खेत में मैं गांव हो जाऊंगा और तुम वहां से दिख रही उस बड़ी सी इमारत को देखकर शहर। नहीं। अच्छा तो मैं इन खेतों के पीछे से गुजर रहे बाईपास हाईवे पे चल रही गाय को देखकर और तुम उस कार को देखकर शहर हो जाना। छि! तुम कितने बुरे हो। क्या तुम मेरे लिए मेट्रो से दिख रहे खेत को देखकर गांव नहीं हो सकते? यार! तुम भी तो खेत से दिख रही इमारत को देखकर गांव नहीं हो रही। 
अच्छा झगड़ा नहीं करते,तुम इश्क़ में गांव रहो और मैं शहर रहती हूं। ओके? ओहके! चलो आओ एक भुट्टा खाते हैं। ये दोनों जगह होकर भी भुट्टे ही रहते हैं। 

Sunday, 22 February 2015

नरेन्द्र ने मुझे बताया कि टूट रहा है नरेन्द्र का तिलिस्म

 मई 2014 में एनडीए की सरकार बनने पर चारो तरफ का राजनीतिक माहौल मोदीमय था। केन्द्र में एनडीए सरकार को 9 महीने बीत गए और बीजेपी दिल्ली विधानसभा चुनाव शर्मनाक तरीके से हार गई। दिल्ली चुनाव में बीजेपी नेताओं के उल्टे-सीधे बयानों और सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाने को हार की वजह बताया गया। लेकिन देश के साथ-साथ विश्व मीडिया ने भी दिल्ली की हार को प्रधानमंत्री मोदी की हार बताया। 
अखबारों में भी ऐसी खबरें आईं लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि ये मोदी की हार है या देश उनकी लोकप्रियता कम हो रही है।

  लेकिन कल मेरा यह मानना ना मानने में बदल गया जब 80 के दशक में चलने वाले स्कूटर पर बैठे एक अधेड़ सज्जन ने मुझे लिफ्ट दी और उस दौरान उन्होंने जो बातें कहीं, उनसे लगा कि सच में अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का तिलिस्म टूट रहा है। संयोग से उनका नाम भी नरेन्द्र था और एक बैंक में काम करते हैं। स्कूटर पर चलने के दौरान पता ही नहीं चला कि कब हम दोस्त बन गए। नरेन्द्र जी अपने अनुभव बताने लगे और मैं पीछे बैठा-बैठा सुनने लगा।

 फिर बोले आप पत्रकार इसलिए मुझसे ज्यादा समझते होंगे और एक सवाल दागते हुए कहा, कांग्रेस सरकार भी प्रो-कॉर्पोरेट थी लेकिन इतना खुलेआम नहीं था जितना इस सरकार ने 9 महीने में ही  दिखा दिया। मैंने कोई जवाब नहीं दिया और लगातार उन्हें बोलने का मौका देता रहा। बोले, मोदी ने सपने तोड़ दिए। साथ ही बोले हालांकि 9 महीने में हम तय नहीं कर सकते लेकिन पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। साफ-साफ शब्दों में कहा, ये कुछ नहीं करने वाले। मैं चुप खड़ा था और एक आम इंसान की उम्मीदों को मरते देख रहा था,वही उम्मीदें जिससे वो वोट देने को बाध्य और उत्साहित होता है। उनकी बातों में नाराजगी के साथ-साथ हताशा थी। नरेन्द्र जी सारा गुस्सा मेरे सामने ही निकाल देना चाहते थे शायद, साक्षी महाराज, साध्वी, आरएसएस से लेकर तमाम वो बयान भी बातें मुझे गिना दिए जो उन्हें पसंद नहीं आईं। लखटकिया सूट पर तो एेसी नाराजगी मानो मैंने ही उसे पहना हो।

हां, एक और बात कही जिस पर ना तो मीडिया ने ध्यान दिया और न ही किसी राजनीतिक विश्लेषक ने। उन्होंने कहा कि यह एनडीए सरकार है लेकिन इसे मीडिया ने मोदी और बीजेपी की सरकार बना कर प्रचारित किया है। जबकि सरकार में लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान मंत्री हैं। तेलगू देशम पार्टी के अशोक गजपति राजू भी सिविल एविएशन मंत्री हैं फिर भी इसे एनडीए की सरकार क्यों नहीं कहा जाता? फिर स्कूटर पर बैठे-बैठे ही राजस्थान सरकार पर आ गए। कहा, 50 से लेकर 95 पैसे तक बिजली महंगी कर दी। लेकिन चोरी और छीजत रोक नहीं पा रहे। कोई योजना ही नहीं है, सभी नेता सिर्फ कैमरे पर चेहरा दिखाने को आतुर हैं।

कुलमिलाकर नरेन्द्र राजनीति के वर्तमान हालात से बिलकुल खुश नहीं थे और ना ही सरकारों की कार्यप्रणाली से। नाराजगी के स्वर में बोले, मंत्रालय में जासूसी हो रही है, लेकिन सरकार जासूसी में शामिल कंपनियों का नाम नहीं ले रही। नाम लेने से कांग्रेस और बीजेपी दोनों बच रही हैं।

नरेन्द्र जी की बातें हो सकता है सबका मत ना हों लेकिन ये उस आम आदमी का मत तो है जो महज कुछ महीने पहले ये सोचकर खुश हो रहा था कि अब सुशासन आएगा। लेकिन ये आम आदमी का मत था जिसे मैं स्कूटर पर बैठ कर सुन रहा था। नरेन्द्र जी की बातों को मैंने सिर्फ सुना। अंत में सिर्फ एक सवाल किया, आपने ये मत कैसे बनाया कि मोदी (एनडीए) सरकार ठीक ढंग से काम नहीं कर रही? ये सवाल मैंने इसलिए किया क्योंकि जितनी नकारात्मक छवि नरेन्द्र जी के मन में बनी, मैं उसका जरिया जानना चाह रहा था। क्योंकि मीडिया ने तो कभी प्रधानमंत्री को नकारात्मक तरीके से नहीं दिखाया। जहां सच में दिखाने की जरूरत थी वहां भी सतही रिपोर्टिंग तक हमारा मीडिया सीमित रहा। नरेन्द्र बोले, चारों तरफ साफ दिख रहा है, जमीन पर कोई असर नहीं हो रहा सिर्फ बातें हो रही हैं।

इससे साफ था कि एक आम आदमी अपना नजरिया बना रहा है वो मौका मिलने पर अपना पक्ष भी रख रहा है, जैसे नरेन्द्र ने मेरे सामने रख दिया ये जाने बिना कि मैं सुनना चाहता भी हूं या नहीं? और आम आदमी के पास  सबसे बड़ा मौका वोट का होता है, इसे किसी को भूलना नहीं चाहिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी नहीं। 

Thursday, 29 January 2015

देखो! पीके हमारे गोले पर सब कुछ लुल्ल नहीं है...


पीके आज सुबह तुम्हारी फिल्म देखी। अच्छी थी। पर इससे पहले शनिवार शाम के एक वाकये का ज़िक्र कर दूं। जयपुर की सर्द शाम पंडित छन्नू लाल मिश्र की ठुमरी , दादरा और भजनों से सराबोर हो रही थी। माहौल अध्यात्मिक हो रहा था। पंडित जी एक ही भजन को अलग-अलग रागों में कई-कई तरह से गा रहे थे। दर्शक उनके और तबले की जुगलबंदी पर जमकर तालीयां बजा रहे थे। आपको लाइव सुनने की चाहत थी इसलिए मैं भी वहीं था। तभी भजन गाते-गाते मिश्र रुके और बोले, क्या आपने उस्ताद ‘बिस्मिलाह खान’ को शहनाई बजाते हुए सुना है? ज्यादातर दर्शकों ने हां में सिर हिला दिया। फिर बोले, वो जो शहनाई बजाते थे, मैं उसे गाकर सुनाता हूं। फिर खान की शहनाई की धुन पंडितजी के सुर में भजन बनकर निकलने लगी। तभी लगा कि नहीं सब कुछ लुल्ल नहीं है। कुछ ‘कार’ बिरादरी है जो अभी हमें बचाकर रख सकती है। ये इस दुनिया में सिर्फ जूता ही नहीं रहने देगी।  ये किसी रॉन्ग नंबर को भी बीच में नहीं आने देगी। हां, ज्यादातर इस रॉन्ग नंबर का शिकार बन चुके हैं पर सभी नहीं।




देखो! पीके हमारे गोले पर सब कुछ लुल्ल नहीं है... सभी नहीं बने इसलिए रामपाल का किला ढह गया, आसाराम का भी खाक हो गया और तुम्हारी रिलीज डेट के दिन ही एक ने सुपरमैन अवतार में आकर खुद ही अपने दरवाजे खोल दिए। जितने भी राम थे, हैं या वो जो राम के नाम पर कुछ भी कर रहे हैं, सब खाक हो जाएंगे या हो रहे हैं, क्योंकि राम भी नहीं चाहते कोई रॉन्ग नंबर हमारे और उनके बीच में आए। खैर! तुम इस गोले पर ऐसे माहौल में आए हो जब यहां सिर्फ जूता रह जाने की कोशिश पैदा की जा रही है। सब अपने अंतर्विरोधों में फंसे हुए हैं। तुम ऐसे वक्त में नंगे होकर आए जहां हम सब कपड़े पहने हुए भी नंगे ही खड़े हैं। पर फिर भी उम्मीद तो रखनी ही चाहिए जैसे तुमने रखी थी। उम्मीद तो रखनी ही चाहिए ताकि हर जग्गू, सरफ़राज से मिल सके। उम्मीद तो रखनी ही चाहिए कि हम सब कभी तो कपड़ों के ऊपर के नंगपन को पहचानेंगे। उम्मीद इसलिए भी रखनी चाहिए कि कई सौ सालों पहले बनाए गए इस रॉन्ग नंबर के नेटवर्क से एक दिन में पीछा नहीं छूट सकता। क्योंकि तुम भी इस नेटवर्क में पहले फंसे थे फिर निकल आए, ऐसे ही हम भी निकल आएंगे बशर्ते कोई पीके इन्हें हमें हमारे अंतर्विरोधों से निकालने आ जाए। क्योंकि हम रॉन्ग नंबर को ही राइट नंबर मान चुके हैं। इसलिए उम्मीद है क्योंकि हमारे गोले पर सब कुछ लुल्ल नहीं है पीके...

Tuesday, 6 January 2015

पराठा कच्चा है...

भाईसाहब ये पराठा अभी कच्चा है, थोड़ा सा और सेकिए, जबाव भी मिल गया,लेना है तो लो वरना कोई बात नहीं और वैसे भी पेट में जाकर तो सब पकना ही है। मन मसोसकर आखिर वो पराठा लेना ही पड़ा क्योंकि मजबूरी है, सुबह की भूख शांत जो करनी है,उस लड़के को जिसे अभी कॉलेज भी जाना है। चूँकि मैं भी वहीं खड़ा था और ये चंचल पत्रकार मन से रहा नहीं गया सो बोल दिया,अगर पेट में जाकर पकना है तो आटा ही क्यों नहीं खिला देते सर! पराठे वाले भाईसाहब ज़रा घूरकर देखे, लेकिन स्थिति बिगड़ने से पहले मैंने संभाल ली और एक पराठे का आर्डर दे दिया, कच्चा ही सही पर मेरी भी हालत उस लड़के जैसी ही थी।
उधर पराठा बन रहा था, इधर इंटरव्यू शुरू! मैंने पूछा,कहते हैं ग्राहक भगवान का रूप होता है, तो फिर भगवान की इतनी सी बात मानने में क्या हर्ज़? पराठा एक्सपर्ट विष्णु ने जवाब दिया, अगर हर भगवान की बात मानने लगे तो भगवान के इस भक्त की हालत खस्ता हो जाएगी। विष्णु जी का जवाब तो अजीब था और इस जवाब ने बहुत सारे सवाल मेरे ज़ेहन में और पैदा कर दिए। बातचीत के लहज़े से पूछा, क्या फायदा होता है तुम्हें? विष्णु जी बोले तुम तो पत्रकारों की तरह सवाल किए जा रहे हो यार, उन्होंने जवाब दिया,फायदा तो क्या बस गैस की थोड़ी सी बचत और थोड़ी जल्दी हो जाती है। जल्दी के चक्कर में सेहत से खिलवाड़ के सवाल पर कोई जवाब नहीं दे पाए विष्णु जी।
खैर! मेरा पराठा बनकर तैयार हो चुका था, गरमागरम कटवारिया सराय का पराठा! इसी को खाकर पराठों वाली गली के पराठों का अनुभव कर रहा था मैं। खाते-खाते पूछ लिया,फिर भी इतनी डिमांड क्यों है?ये जवाब सही और पूरी ईमानदारी से दिया गया। देखो यार! दिल्ली में हज़ारों बच्चे हर साल पढ़ने आते हैं, कुछ महीनों के लिए या ज्यादा से ज्यादा सालभर के लिए। उन्हें रहने और खाने का इंतजाम सबसे पहले करना पड़ता है। रहने के लिए पांच से छह हजार रूपए में रूम मिल जाता है, 8x8 का और सस्ता खाना हम उपलब्ध करा ही देते हैं, सिर्फ दस रुपए का पराठा! घर से बाहर, घर जैसा खाना! और हर कोई बड़े होटल पर जाकर तो नहीं खा सकता न!
मुझे अब कच्चे पराठों की वजह समझ में आई कि अगर आप मजबूर हैं तो ये कमी किसी के धंधे में चार चाँद लगा सकती है। वैसे मेरा पराठा उस लड़के से ठीक बनाया विष्णु जी ने, शायद मेरे सवाल-जवाब कम कर गए। पानी पिया, दस रुपए देते वक़्त मैंने कहा, वैसे मैं पत्रकार बिरादरी से ही हूं। विष्णु जी ने हल्की सी मुस्कराहट के साथ पैसे लिए और मैं चल पड़ा कॉलेज की तरफ, पत्रकारिता पढ़ने!

बिस्मिल्लाह की शहनाई भजन भी गाती थी...

1. मुश्ताक भाई गणेश जी को निमंत्रण देने जाएंगे तो गणेशजी क्यों नहीं आएंगे। मुश्ताक ने गाना गाकर कहा, देखो गणेश मुझे पूजा-पाठ नहीं आता पर मेरी नाक का सवाल है, भरे राजदरबार में मैं आपको बुलाने की बात कह कर आया हूं और मुश्ताक जीमण (सामूहिक भोज) का न्योता गणेशजी के पैरों में रखकर आ जाता है। गणेशजी ने मुश्ताक भाई का न्योता स्वीकार किया और जयपुर राजघराने की ओर से आयोजित जीमण में इंसान के भेष में आ गए। फिर पृथ्वी पर शुरू हुई इंसान का भगवान को ना समझ पाने की नादानी। बहुत देर से पंक्ति में लगा व्यक्ति पूछता है, भइया खाना चालू करो। पंडित जी की आवाज़ आती है अभी गणेश जी को भोग लग रहा है। पंक्ति में आगे-आगे लगे गणेश जी के साथ आए नारद बोलते हैं, गणेश जी तो मेरे साथ में हैं, पंडित जी तिरस्कार की नज़रों से नारद को देखते हैं और शायद सोचते हैं कोई मूर्ख है। तभी एक चतुर आदमी पहले जीमने के लालच में दोनों को पंक्ति में पीछे ढकेल देता है।
2. 20 दिसम्बर 2014 की सर्द शाम। जयपुर में ही छन्नू लाल मिश्र की भजन संध्या। मतलब पीके फिल्म की रिलीज के ठीक दूसरे दिन। छन्नू जी भजन ही गा रहे थे। तमाम तरह के रागों को ऐसे समझा रहे थे मानो सेन्ट्रल पार्क में बैठे सभी श्रोता उनके शिष्य हों। लोग भी आनंद ले रहे थे। सर्दी का अहसास हो रहा था तो तब जब वे थोड़ी देर के लिए रुकते। भजन गाते-गाते अचानक बोले, आपने बिस्मिलाह ख़ान को शहनाई बजाते सुना था क्या कभी? कुछेक हाथ उठे। छन्नू जी बोले, वो शहनाई से जो धुन निकालते थे, मैं गाकर सुनाता हूं। फिर बिस्मिलाह की शहनाई की धुनें भजन बनकर छन्नू जी के मुंह से निकलने लगीं।
पहला किस्सा शायद सही न हो लेकिन दूसरा एकदम सही है। पहला भले ही एक प्ले था मगर मुश्ताक के किरदार ने कितना बड़ा काम किया। इसी तरह छन्नू जी की बात को उस वक्त शायद ही लोग समझ पाए हों लेकिन उन्होंने अपने कलाकार होने का फर्ज़ अपना काम करते हुए निभा दिया। वो भी उस मुश्किल वक्त में जब धर्म की अनेक परिभाषाएं रची जा रही हों। मज़हब को केन्द्र में रखकर मॉक ड्रिल हो रही हों। धर्म को उसी राजनीति ने बहस का विषय बना दिया हो जिसे धर्म को राज्य से दूर रखने को कहा गया हो। उस समय में जब पैदा होते बच्चे भी नहीं बख्शे जा रहे। ऐसे काल में जब हम सब संगठनों के बनाए प्रोपेगेंडा में फंस चुकें हों, हर काम को उसी नज़रिए से दिखाया जा रहा हो और हम सब कुछ जानते समझते हुए भी कुछ न कर पाने की स्थिति में हों सिवाय फेसबुक पर लिखने के। उस वक्त कलाकार अपना काम कर रहा है। शायद यही कलाकार को करना भी चाहिए या यूं कहें सारी ‘कार’ बिरादरी को यही करना चाहिए जो मुस्ताक़ और जो छन्नू जी ने किया। मज़हब की दीवार किसी अर्जुन के दीवार पर निबंध सुनाने से नहीं टूटने वाली क्योंकि इस दीवार को बनाने वालों ने सिर्फ भावनाओं का इस्तेमाल किया है और कोई भावनाओं के बारे में भला कलाकार से ज्यादा कौन समझ पाता है।