Saturday, 29 August 2015

अंधेरे का भी अपना उजाला होता है...

अंधेरे का भी अपना उजाला होता है जिसे मैं देख पा रहा हूं। एक पठार और उसकी तलहटी पर बसे इस कस्बेनुमा गांव की किसी ऊंची जमीन पे बने घर से इस अंधेरे को देख रहा हूं। कई किलोमीटर दूर तक जुगनुओं की तरह टिमटिमाते बल्ब और उन तक पहुंचने वाली सड़कों तक फैला उजाले को समेटे हुआ अंधेरा। बारिश के इंतज़ार में चीखते झींगुर और दूर किसी खेत से मोर के बोलने की आवाज बहुत कुछ कह रही है। नज़रों के ठीक सामने समन्दर की तरह फैला हुआ जंगल सा दिख रहा है जहां दिन में बहुत से गांव दिखते हैं। इनसे नज़र हटाकर आसमां पर टिकाओ तो नज़ारा कुछ अलग नहीं है। नीचे की तरह ऊपर भी नीले आसमान का जंगल और किसी लालटेन सा जलता ये चांद, जो उजाला तो कर रहा है मगर उस अंधेरे को चीर नहीं पा रहा। ये कुछ दिखा पा रहा है तो बस कुछ अधबने से घर जहां कभी ऐसा ही जंगल रहा होगा।

सोच रहा हूं इस पठार की चोटी पर बने किले से ये सब कैसा दिखता होगा? जब बल्ब नहीं होंगे तब किलोमीटरों दूर क्या चमकता होगा,क्या सच में जुगनूं ही चमकते होंगे? तब मोरों की आवाज़ क्या इसी तरह खेतों से आती होगी, क्योंकि बुज़ुर्ग तो कहते हैं कि तब मोर आंगन में ही घूमा करते थे। फिर ये सोचकर फालतू सोचना बंद कर दे रहा हूं कि शायद यही परिवर्तन है, यही विकास है।

Monday, 27 July 2015

कलाम मेरी यादों में...

लग रहा है जैसे वो कल का ही दिन था। जयपुर साहित्य सम्मलेन का दूसरा या तीसरा दिन था। रोज की तरह वहां पहुंचा तो भीड़ देखकर लगा लौट जाऊं पर दिल नहीं माना, प्रेस से होने का थोड़ा फायदा मिला और मैं और लोगों से जल्दी अलग लाइन से अंदर पहुँच गया। फ्रंट लॉन खचाखच भरा हुआ था। 82 साल के एक युवा को सुनने। 1 घंटे पहले ही लोग आ-आकर जमा हो गए थे।
95% लोग मेरी उम्र के दिख रहे थे। मैंने आगे पहुंचने की बहुत कोशिश की पर यहां सफल नहीं हो सका। भीड़ के बीच में पहुंच गया पर मंच दिख ही नहीं रहा था। मुश्किल से बाहर निकला और फिर पीछे खड़ा हो गया। अभी तक मंच खाली था और मैं एक अदद जगह की तलाश में।
तभी लॉन तालियों से गूंज उठा। 40-50 सेकंड तक तालियां बजती रहीं। आप आए लोग खुद ही चुप हो गए, भीड़ अपने आप ही अनुशासित हो गई जो थोड़ी देर पहले एक-दूसरे पर चढ़-मर रहे थे। जो जहां था वहीँ खड़ा रहा। पता चला होटल डिग्गी पैलेस के बाहर स्क्रीन्स लगाई गई थीं। सड़क पर ट्रैफिक रुका हुआ था या शायद पुलिस ने जाम के चलते बंद कर दिया था। हां पर सड़क से होटल के बीच रास्ते में पैर रखने को जगह नहीं थी। सब जैसे थे वैसे ही खड़े रह गए क्योंकि आप स्टेज पर आ गए थे।
माय डिअर फ्रेंड्स से अपने शुरू किया था और फिर  बोलते रहे। मेरे जैसे हज़ारों-हज़ार आपको सुनते रहे। बस सुनाई दे रहा था तो वी लव यू और तालियों की गड़गड़ाहट। आपकी लिखी किताबें सैकड़ों लड़के-लड़कियों के हाथों में रखी हुई थीं। मेरे आस-पास वाले बुदबुदा रहे थे, मिस्टर कलाम सच अ रियल मैन। इस ऐज में कहां से लाते हैं इतनी एनर्जी,इतना स्टेमिना? तभी आपने कहा (अगर मैं सही समझा तो) यूथ से मैं बहुत सीखता हूं और वो मुझे ताकत देते हैं। पूरा फ्रंट लॉन तालियों से गूंजता ही रहा।
आप लगातार बोलते जा रहे थे और हम सुने जा रहे थे। आपकी एनर्जी और लोगों को देख लग रहा था मानो कोई 20-25 साल का लड़का मंच पर हम सब में लगातार खाली हो रही किसी जगह को भर रहा हो। एक बाप अपने बच्चे को कंधे खड़ा कर पूछ रहा था,दिखे? हां पापा। यही हैं कलाम, बहुत बड़े साइंटिस्ट और प्रेसिडेंट भी।आपने बोलना बंद किया और हाथ हिलाते हुए नीचे उतरे। लोग आगे की तरफ भागने लगे अपने रियल हीरो के लिए।
मैं खुद को किस्मत वाला समझता हूं कि आपको सुनने का मौका मिला। हालांकि एक सपना अब कभी पूरा नहीं हो सकेगा पर अब उसका दुख बिलकुल नहीं है। आप अपने परिवार में 65% युवाओं को छोड़कर गए हैं। हमने 83 साल का एक जवान और ऊर्जा से भरा इंसान खोया है। लेकिन मेरे लिए आप मरे नहीं हैं बल्कि ज़िंदा हुए हैं फिर से उन तालियों की गड़गड़ाहट में, उन सभी हज़ारों लोगों में बिलकुल उसी अनुशासन में, उन हाथों में लगी आपकी किताबों में, स्क्रीन्स से चिपकी हज़ारों आंखों मेंऔर कंधे पर बैठे उस मासूम में। आपका दिया हुआ बहुत कुछ रह गया है हमारे पास जिसे सहेजने और आत्मसात करने की जरूरत है। आप मेरे बचपन में भी थे, आज के बचपन में भी हैं और मेरे बच्चों के बचपन में भी रहेंगे।

नमन

Friday, 26 June 2015

सड़क किनारे अखबारों की जाज़म, चार रोजेदार और पांचवा मैं

कोई सुविधा में तो कोई दुविधा में इस शहर की ओर भागा आता है। ज्यादातर दुविधा में ही आते हैं, क्योंकि सुविधा शहर में रहने वाले अभिजात्य वर्ग के पास ही होती है। वो चारों भी दुविधा में ही इस शहर की ओर आ गए। बच्चे बीमार थे जिनका जे.के.लॉन अस्पताल में इलाज चल रहा था।

गुरुवार को मैं भी जे.के.लॉन पहुंच गया था, किसी को लेने। बाइक खड़ी की ही थी कि हेलमेट उतारते ही कुछ एेसा दिखा जो सबसे अलग लगा। तीन शख्स और एक बच्चा ठेर से अखबार पर रखे पपीते और केले खा रहे थे। साथ में नमक और भुजिया नमकीन भी। एक अंकल जैसे शख्स के सिर पर टोपी थी तो तुरंत समझ गया कि मुसलमान हैं और रोजा खोल रहे हैं। मैं समझ गया था फिर भी मन नहीं माना और पूछ लिया, रोजा खोल रहे हैं क्या? चारों ने एक साथ सिर हिलाया, फिर पास बुलाने लगे। मैं ना-नुकुर करता रहा लेकिन वो बुलाते रहे। आखिरकार उनकी ज़िद ने बुला ही लिया। मुझे लग रहा था कि बाहर से आए हैं और एक ही परिवार के हैं। इसलिए साथ बैठकर रोजा खोल रहे हैं। लेकिन वो चारों अलग-अलग गांव से। ना किसी की किसी से दोस्ती और ना ही कोई पहले मुलाकात। अस्पताल के हालातों ने सलाम-दुआ शुरू करवा दी थी बस।


बोले आप भी लीजिए, नहीं मैं तो अभी खाकर ही आ रहा हूं, आप खाइए आपका रोजा है। अरे तो क्या हुआ? लेना ही पड़ेगा एक तो, इस तरह एक केला खाने के साथ पांचवा मैं भी उनमें शामिल सा हो गया। मेरा रोजा नहीं था फिर भी लगा जैसे सुबह से कुछ खाया ही नहीं, उनके प्यार से दिए उस केले में इतनी मिठास थी कि कुछ देर के लिए भूल गया यहां क्यों आया हूं।

बैठ गया और बातचीत करने लगा। उनमें से एक निवाई से बादशाह खान थे तो दूसरे बौंली से अय्युब, अंकल हिम्मत खान अलवर से आए थे। 12-13 साल का लड़का शाहरुख बादशाह जी के साथ था। लेकिन रोजा एेसे खोल रहे थे मानो सालों पुरानी पहचान हो और एेसे ही रोजाना खाना साथ खाते हों। आश्चर्य तो हुआ लेकिन सुखद। मैं इतना ही बोला था कि मुझे तो लगा कि कोई परिवार के लोग ही हैं आप, हिम्मत अंकल बोले, घर से दूर जो काम आए वो परिवार के ही तो होते हैं। अब मेरा और अय्युब का मरीज बादशाह जी की बीवी की देखभाल में है। अनजानी जगह जो इंसानियत से पेश आए वो अपना ही हो जाता है। बेटा तुम पपीता भी तो खाओ, नहीं अंकल केला ही काफी है थैंक्यू।

अच्छा शाहरुख को क्या हुआ है, इसके गले में दिक्कत है, सांस लेने में तकलीफ होती है, खाते-खाते बादशाह जी ने एेसे रिपोर्ट सौंपी जैसे मैं ही डॉक्टर हूं। हिम्मत अंकल अब भी खा रहे थे और बादशाह, अय्युब जी नमाज़ की तैयारी करने लगे, वहीं सड़क किनारे उस लैब की सीढ़ियों पर। जल्दी-जल्दी नमाज़ पढ़ी, जूतियां पहनते हुए बोले, जल्दी चलो खां साब नहीं तो डॉक्टर राउंड से चला जाएगा, नमाज़ का क्या है दो 'सूरत' बाद में पढ़ लेंगे। जाते-जाते मैंने पूछा, काम क्या करते हैं आप, बादशाह बोले, खेती और अय्युब भी कुछ एेसा ही। शाहरूख को लेकर दोनों चले गए। जाते-जाते बोले, एेसी ही इंसानियत से मोहब्बत बनी हुई है मुल्क में। हिम्मत खान थोड़े बूढ़े थे तो पीछे रह गए या शायद उन्होंने पूरी नमाज़ पढ़ी थी। वो नमाज़ पढ़ रहे थे मैं उन्हें बस देख रहा था, आश्चर्य से भरा, अवाक सा। नमाज़ पढ़ते हुए उनकी ये फोटो उतार ली।


नमाज़ पढ़ते हिम्मत खान
फिर लगा डिलीट कर दूं क्योंकि मैंने इनकी एक स्वतंत्रता का हनन कर दिया। मन थोड़ा बेईमान हो गया, डिलीट करने से बेहतर लगा कि उन्हें बता दूं। उनकी नमाज़ पूरी हुई, थोड़ी घबराहट के साथ मैं बोला, जब आप नमाज़ पढ़ रहे थे तो मैंने आपकी ये फोटो ली, आपको बुरा लगा हो तो मैं इसे डिलीट कर सकता हूं। इस वक्त मैं हिम्मत खान जी की आंखों में देख रहा था, उनका एक हाथ मेरे सिर पर था और दूसरा पीठ पर, हल्की सी आवाज में बोल रहे थे, बुरा क्यों लगेगा, जामा मस्जिद की भी तो आती है हर ईद पर। हाथ लगातार मेरे सिर पर ही टिका हुआ था, मुंह से सिर्फ दुआएं निकल रही थीं, मैं भावुक हूं, इसलिए हो गया। समझ में नहीं आ रहा था कि बोलूं क्या, कुछ नहीं सूझा तो अपने नंबर ही दे दिए, अस्पताल में कोई जरूरत हो तो बताना, कुछ डॉक्टर हैं जिन्हें जानता हूं। वो ठीक है कहते हुए सिर से हाथ सरकाते हुए चले गए। सड़क पार करते हुए मैं उन्हें लगातार देख रहा था।

रोजा खोल रहे हैं क्या? जैसे साधारण से वाक्य के साथ शुरू हुई उनसे बातचीत से उनके साथ एक भावनात्मक रिश्ता बनने में बमुश्किल 10 मिनट लगे। कुछ रिश्ते एेसे ही बन जाते हैं जिन्हें जिंदगी में कभी निभाने का मौका हमें नहीं मिल पाता लेकिन वो एक कभी ना भुला पाने वाला किस्सा बनकर हमेशा हमारे साथ रहता है, जैसे मेरी जिंदगी की ये बन गया।

Wednesday, 24 June 2015

मनाली में उस रोज की वो खूबसूरत सुबह

आपको कैसा लगता है यहां? मतलब, आप नेपाल से हैं तो मनाली में क्या ऑब्ज़र्ब किया आपने?
पता नहीं क्यों पर मुझे लगता है कि यहां लोग हर वक़्त कुछ ढूंढ़ रहे हैं, क्या है जो उन्हें नहीं मिल रहा, मैं नहीं जानता क्या, पर हज़ारों लोग तभी यहां आ रहे हैं। हमारे लिए खाना बनाते-2 तारा (कैंप में कुक) मनाली में खुद का जीया हुआ हमें बता रहे थे।

कैम्प से कहीं दूर उस ऊंचाई पर
 तारा की बात 200% सही। सब यहां कुछ ढूंढ़ने आ रहे हैं, अपने-अपने हिसाब से लेकर जा रहे हैं लगभग एकसा।
ये सब लिखते-2 पहाड़ के पीछे से वो निकल आया जिसका 1 घंटे से इंतज़ार कर रहा था। पता ही नहीं चला,चला तब जब मेरे सर की परछाईं बगल वाली छत पर दिखने लगी।

कांपते हाथों में गुनगुनाहट सिर में होकर घुसी तो हाथों ने कांपना बंद कर दिया है। टेबल से ओस पानी बन टपकने लगी है, सामने के पहाड़ का झरना अब और सफ़ेद हो गया है, व्यास नदी का सुर थोड़ा धीमा हो गया है और ये तितली भी मस्तानी सी होकर गमले में उगे इस फूल पर आ बैठी है, ठीक पीछे वाली रात में जिए वो पल कैंडल लाइट डिनर वाली टेबल और बोन फायर की राख के साथ सबूत की तरह दिख रहे हैं।

इनके बीच में ही बहती है व्यास नदी
 तारा की बनाई अच्छी वाली एक चाय गटक चुका हूं। पहाड़ी क्यूट बच्चे स्कूल के लिए भी निकल चुके हैं,एक छोटी बच्ची ने एक छोटे बच्चे को पीठ पर लादा हुआ है और दोनों का बैग एक और छोटी बच्ची ने संभाला हुआ है। तरुण (कैंप का मालिक) की मां ने उसी जमी हुई सुबह में ही हमें गांव में जाने का रास्ता बता दिया है, पहाड़ों की ज़िन्दगी का अनुभव अपने चौकोर चेहरे में बन आईं झुर्रियों में समेटे हुए जब उन्होंने गलत रास्ते से हमें ऊपर चढ़ते हुए देखा तो सही वाले 2 रास्ते बता कर गयीं, ये भी कि ऊपर गांव में मंदिर भी है।

ये झरना जो उस छत से उठने ही नहीं देता
 मनाली में चौथे दिन की ये सुबह सामने कई सौ फ़ीट से गिर रहे झरने, लाखों देवदार के पेड़, इठलाती सी एक नज़ाकत में बहती हुई व्यास और गमले के फूल पर मंडराती उस तितली की तरह बेहद खूबसूरत है।

Monday, 22 June 2015

इसलिए मैं पीछे मुड़ कर नहीं देखता मां

मन तो करता है कि बाइक पर बैठे-बैठे ही पीछे मुड़कर एक बार तो देख ही लूं लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाता। मुझे पता है पीछे वही होगा जो मैं नहीं देखना चाहता। गेट पर लटकते दो चेहरे जिनमें से पक्का एक तो साड़ी से अपनी आंखें पोंछ रही होगी और दूसरी अजीब सा चेहरा बना कर लौट चुकी होगी। जब-जब घर से वापस आने के लिए बाइक पर पीछे बैठता हूं, टायर से कच्ची जमीं पर बनने वाले निशां की तरह बहुत कुछ पीछे छुटता जाता है और वो निशान अगली बार घर आने तक बने ही रहते हैं।

घर से बस स्टैण्ड तक के बमुश्किल 5 मिनट के उस सफर में जी जा चुकी उम्र को तय कर जाता हूं फिर कोर पर आई बूंद को चश्मे में छुपाने की उस कड़ी परीक्षा में हर बार सफल भी हो जाता हूं, लेकिन इस सफलता का कभी जश्न मनाने का मन नहीं करता। बस में बैठने के बाद भी खिड़की से उन्हीं मकान, दुकान और सड़क को देखता हूं जिन्हें बचपन से देखता आ रहा हूं पर ये कभी बोर नहीं करते जैसे जयपुर की अब हर एक चीज करती है। सब पीछे छूटता जाता है और मैं आगे बढ़ता हुआ भी खुश हो रहा होता हूं कि कितना पीछे जा रहा हूं।



मुझे पता है मेरे आने के बाद मां की ये शिकायत रहती ही है कि मैं कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता, मन करता है मां पर हिम्मत नहीं होती। अगर पीछे देखूंगा तो फिर बहुत पीछे की यात्रा पर निकल जाने का मन होने लगता है। शाम तक के खाने के लिए तुम्हारे बनाए पराठे और उनके बीच रखे अचार की खुशबू से वो यात्रा शुरू होगी तो पता नहीं कहां जाकर रुकेगी। गर्मी में बिजली के ना आने पर साड़ी के पल्लू से की गई वो हवा उस यात्रा को और आरामदायक बना देगी। उसी यात्रा के दौरान सिर्फ मेरे लिए फ्रिज में रखे गए उस मक्खन को मैं उन पराठों से चट कर जाऊंगा और तुम धीरे से पापा की तरफ इशारा कर के हंसोगी, हंसते हुए असली घी-दूध की ताकत का मुझे अहसास भी कराया जाएगा, इस ताने के साथ कि क्या रखा है 'तुम्हारे' शहरों में मिलावटी सामान के अलावा? साथ ही कहा जा रहा होगा कि मेरे पास 15 दिन रुक जा, 5 किलो वजन ना बढ़ जाए तो....।

उसी यात्रा में अगर किसी शाम घर से बाहर निकल जाऊंगा तो उसी मोहल्ले में पहुचूंगा जहां चलना सीखा था, उस घर में जाने का शौक कतई नहीं है पर उसकी छत पर बैठकर अपने बचपन को नजदीक से देख पाने की तलब वहां लेकर पहुंच जाती है। घूम-फिर कर वापस उसी जगह पहुंचूगा जहां से यात्रा शुरू हुई थी यानी घर और फिर तुम कह रही होंगी कि कहीं जाता ही नहीं, घर में ही पड़ा रहता है। पर मैं घर में पड़े रहने के लिए ही तो घर आता हूं ताकि उस पूरी यात्रा से बच सकूं जिस पर निकलने के बाद थोड़ी खुशी और दुख ज्यादा होता है। दुख ये नहीं कि वो खुशी के पल जो हमने यहां जिए हैं वो कम हैं या कम रहे, दुख होता है कि हम उस 'बेहतर भविष्य' के लिए एक सुंदर वर्तमान को विदा कह देते हैं जिसे हम पूरा जी भी नहीं पाते।

हम प्रवासी लोगों के साथ यही एक दिक्कत है घर,गांव का नाम आते ही हम भावुक हो एक अनजानी सी यात्रा पर निकल जाते हैं। बाइक पर 5 मिनट के फासले में भी एक यात्रा लगभग पूरी हो जाती है और पीछे मुड़कर देखने में उस यात्रा के बहुत लंबे होने का खतरा पैदा हो जाता है, इसलिए मैं घर से लौटते वक्त पीछे मुड़ कर नहीं देखता मां।

Friday, 5 June 2015

लंगोट से टैटू तक पहुंची भक्ति!

क्या धर्म या उसके प्रतीकों को लोगों को हिसाब से बदलते रहना चाहिए, उसकी पद्दतियां और पूजा-पाठ के तरीके भी समय के हिसाब से बदलने चाहिए? क्या भगवान को सिर्फ उन्हीं पारंपरिक तरीके से खोजा जा सकता है? एेसे कई सवाल हैं जो अक्सर मेरे दिमाग में आते रहते हैं, तब ज्यादा, जब नए लोग उसे अपनाने की कोशिश करें और उन्हें फिर उस धर्म के हिसाब से ही कपड़े पहनने पड़ें या सारे काम पुराने तरीके से ही करने के बिना लिखे नियमों के हिसाब से करना पड़े। जब देखता हूं कि वृंदावन के इस्कॉन मंदिर में आकर भक्ति में रमने वाले विदेशी लोग अपना सारा कल्चर छोड़कर उसी पारंपरिक लिवास में आ जाते हैं या अपने ही देश में कई युवा भी उसी तरीके से किसी सम्प्रदाय में शामिल होते हैं तो मन सवाल करता है कि क्या ये जिस भगवान की खोज करने निकले हैं उसी लिवास और कल्चर में रहकर नहीं कर सकते? क्या युवा अपने स्टेटस को मैंटेन करते हुए पूजा नहीं कर सकते? 

गुरूवार को इस बात का किसी हद तक जवाब मिल गया, हां कर सकते हैं। भक्ति लंगोट में या हिमालय पर ही जाकर ही नहीं की जा सकती बल्कि अपने स्टेटस को साथ लेकर और फैशन को मैंटेन करते हुए भी की जा सकती है। यो-यो टाइप बाल और लगभग पूरे बदन पर टैटू गुदवाया हुआ वो शख्स पहली नज़र में गिटारिस्ट ही लगा लेकिन जब ऊपर से नीचे तक गौर से देखा तो वो उन सब पारंपरिक लोगों से कम नहीं था लेकिन था कुछ अलग। जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में उन लड़कों की पूरी टोली उसी अंदाज में थी जिस अंदाज में वो शख्स था। हाथ में गुप्ती (जिसमें माला फेरी जाती है), गले में राम नामी गमछे के साथ-साथ नए जमाने के टैटू,बड़ी सी दाढ़ी और बाल एेसे कि अगर हम कटा लें तो घर निकाला मिल जाए! महंगी से जींस और टी-शर्ट, उस शख्स के बाकी दोस्त भी लगभग इसी अंदाज में थे।

उन्हें मंदिर में टहलते देखा तो उनके पीछे हो लिया, जहां वो जाकर बैठे उनके बगल में जाकर बैठ गया लेकिन वो जनाब गुप्ती में हाथ डाले माला फेर रहे थे औऱ मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि किस तरह से बात शुरू करूं। काफी देर बाद हिम्मत जुटाई और पूछ लिया, आप जयपुर से ही हैं (क्योंकि उनके गेटअप से लग नहीं रहा था), जवाब मिला, हां, इसी सवाल के बाद तीन बार मैंने माफी भी मांग ली, डिस्ट्रब किया हो तो सॉरी! नाम पूछा और एक फोटो लेने की मंजूरी मांगी, उन्होंने सिर्फ सिर हिलाया और मैंने झट से ये फोटो क्लिक कर ली। 



फोन नंबर भी मांग लिए, सेव करने के लिए नाम पूछा तो नाम मिला, करन। करन 'भगत' के नाम से नंबर भी सेव कर लिया, थैंक्स बोला और चला आया। शुक्रवार को करन को फोन किया और वही पूछा जो ऊपर लिखा है क्योंकि मुझे लगा कि करन से बेहतर जवाब शायद ही कोई दे पाए। उन्होंने एक ही लाइन में जवाब दिया, 'मैं एक आर्टिस्ट हूं, खुद का टैटू स्टूडियो है और भक्ति का माहौल बचपन से घर में रहा है। इसलिए यही लुक मुझे शूट करता है। मुझे ये पसंद है'।

इसके बाद करन के फेसबुक पेज पर भी गया, हर दूसरे यो-यो टाइप स्टाइल के फोटो के बाद राधे-राधे और हरे-कृष्णा की पोस्ट देखने को मिली। ज्यादा आश्चर्य तब नहीं होता जब कोई विदेश का आदमी इस लुक में दिखाई देता, वो अक्सर दिखाई देते हैं, जटा और टैटू के साथ हाथ में गुप्ती लिए लेकिन जब करन को देखा तो लगा कि कुछ तो बदल रहा है। 


करन के फेसबुक पेज से ली गई तस्वीर

मेरे अलावा शायद और भी बहुत लोग थे उस जगह जो उन्हें अजीब नज़र से देख रहे थे। लेकिन किसी की नज़रें वो नहीं कह रही थीं जो अक्सर एेसा हो जाने पर तथाकथित धार्मिक ठेकेदार कहते फिरते हैं। जींस को संस्कृति और धर्म के ह्रास की वजह बताते फिरते हैं और भी पता नहीं क्या-क्या...यही लोग ये भी कहते हैं कि हिंदु धर्म सहिष्णु है और जींस पहन लेने पर धर्म का नाश भी करवा देते हैं।

करन जैसे हो सकता है सैंकड़ों-हजारों लोग और हों, अच्छा ही है, होने भी चाहिए। धर्म वही जो लोगों को अपनी सहुलियत से जीने की आजादी देता हो, अगर एेसा ना हो तो फिर वो ढोना पड़ेगा और एेसे ऊल-जुलूल बयान देने वाले शायद यही चाहते हैं...।

Sunday, 31 May 2015

गुर्जर आंदोलन और उसमें सांस्कृतिक योगदान

करीब 10 दिन तक चला इस बार का गुर्जर आरक्षण आंदोलन फिर एक बार ख़त्म हुआ. कुछ समझौते हुए जिन पर सरकार और गूजरों में बात बनी है. इन सब टेक्निकल बातों पर फिर कभी लिखना होगा लेकिन जब आंदोलन से जुड़े वीडियो में यू-ट्यूब पर खोज रहा था तो कुछ कमाल का मिला हालांकि इससे मैं अनजान तो नहीं था लेकिन इस नज़रिये से पहले इन वीडियो को देखा नहीं था.

इन्हें देखने के बाद कुछ सवाल मेरे मन में उठे कि क्या किसी आंदोलन में उभरे नेता ही उस आंदोलन की सफलता या विफलता के हकदार होते हैं या सफल या विफल होने पर भी वही इतिहास में दर्ज़ होंगे? विडियोज को देखने के बाद जवाब आया, शायद नहीं, पटरियों पर हजारों लोग भले ही बैठे हों पर उसी समाज के सैंकड़ों लोग और मोर्चों पर भी काम कर रहे होते हैं.

आंदोलन सही है/था या नहीं की बहस को छोड़ दिया जाए तो यू-ट्यूब पर टहलते हुए कुछ और समझ आया. जो गीत यू-ट्यूब पर मिले उन्हें स्थानीय (ब्रज) भाषा में रसिया कहते हैं. देखा तो इस बात की समझदारी और बढ़ी कि हमारे भारतीय समाज में कैसे एक नेता को गढ़ा जाता है. जन सामान्य में किस तरह उसे स्वीकार्य बनाया जाता है और अलग-अलग तरीकों से कैसे अपनी बात को आगे बढ़ाया जाता है.

भारतीय राजनीति में नेता एेसे ही गढ़े जाते रहे हैं, तरीके अलग-अलग हो सकते हैं. इन वीडियोज को देखने से समझेंगे कि कर्नल किरोड़ी बैंसला सिर्फ पटरियों पर बैठकर और मीडिया से बात कर नेता नहीं बने, उन्हें सामान्य ऊंट चराने वाला और शहर-कस्बों में आकर दूध बेचने वालों में मशहूर एेसे ही रसियों ने किया,जिनकी पहुंच एेसे गूजरों तक है जहां किरोड़ी शायद ही कभी पहुंच पाए होंगे या पहुंचेंगे.



पटरी पर बैठे उन गूजरों को घरों से खाना बनाकर भेजती उन गुर्जर औरतों का भी उतना ही हाथ है जितना कि पटरियों की क्लिप उखाड़ते हाथों का है. “राम सौ लगे जीजी राम सौ लगे, ठाड़ौ भाषण दै रो कर्नल भगवान सौ लगे” मतलब खड़े-खड़े भाषण देते हुए कर्नल भगवान राम से लग रहे हैं. यही वो गीत या वो संस्कृति है जिनकी वजह से किरोड़ी सामान्य गूजरों में अपनी पहचान बना सके हैं.

 राम के जैसा बना दिया गया पूर्वी राजस्थान के एक छोटे से गांव में जन्मा साधारण सा आदमी यूं ही भीलवाड़ा के गूजरों में पहचान नहीं बना सकता! दरअसल, किसी भी आंदोलन में लोकगीतों और संस्कृति का अपना योगदान होता है. अन्ना आंदोलन के उन गिटार वाले लड़कों को कौन भूला होगा अभी तक!

वैसे हमारे ब्रज में लोकगीत खासकर ख्याल और रसिया का चलन बहुत सिमट सा गया है, बहुत कम उस पीढ़ी के लोग बचे हैं जो रसिया बनाते हैं और उन्हें संगीतबद्ध करते हैं लेकिन जब पटरियों पर 45 डिग्री की गर्मी में सिर्फ लोगों को नेता लोगों के इशारे पर ही काम करना हो तो बैठे-ठाले करें भी क्या? ‘पुड़िया आरक्षन की तोसे पैले लैगौ मुड़िया (कर्नल बैंसला का गांव) वारौ…’

हालांकि मैंने कभी आंदोलन को उनके बीच जाकर कभी नहीं देखा लेकिन उसी इलाके से हूं तो इतना जानता ही हूं इतने मस्त लोग कि इतनी गर्मी में बस में चलते हुए भी रसिया गाने लगते हैं. कुछ ऐसा ही राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान हुआ था जब किरोड़ी मीणा ने ‘राजपा’ पार्टी बनाई तो एक गाना बनाया गया जो सभी तरह के लोगों को समझ में आए. हिंदी के अलावा स्थानीय भाषा में भी ऐसे ही गाने बनाए जो लोगों को अपील करे.
कुछ ऐसा ही गुर्जर आंदोलन में भी हुआ. ‘जैपुर में अड़ गयो बैंसला, जभे हटेगो कर केँ फैंसला’, ‘आरक्षन कौ लफड़ो फंस गौ, जीजी (बहन) मेरौ बैंसला तौ अड़ गौ’… 

ये ब्लॉग ' Faltu Khabar' पर भी प्रकाशित हो चुका है।

Monday, 18 May 2015

'उस्ताद' बाघ के नाम सॉरी वाला ख़त

प्यारे उस्ताद! सबसे पहले सॉरी। तुम्हारी इस हालत के लिए! मैं भी पढ़ रहा हूँ 4 दिन से सब...इतना ही समझा कि तुम बेक़सूर हो। तुम्हारा इतिहास भी पढ़ने की कोशिश की तो पता चला कि तुम थोड़े शरारती हो लेकिन बाघों की इस शरारत को हम इंसान 'हिंसा' कहते हैं और तुम्हारे पानी पीने के साधारण काम को तुम्हारी 'अदा'। क्योंकि तुम्हारी इस ‛अदा' के दरअसल हमसे पैसे वसूले जाते हैं।

खैर! मामला इतना सा है कि रणथंभौर में तुम्हारे 40000 वर्ग किलोमीटर के घर में इंसान घुसे और तुमने अपना घर बचाने के लिए अपनी शरारत का इस्तेमाल किया और इसमें उसकी मौत हो गई, ये शरारत तुम 4 बार कर चुके हो। लेकिन 'शरारती उस्ताद' शायद तुम्हें नहीं पता 'गांधी' के इस देश में ऐसी शरारतें स्वीकार नहीं हैं। तुम्हें सज़ा दी जाएगी... और तुम्हें सज़ा दी भी गयी है। आखिर सरकारें बनी ही क्यों हैं? तुम्हें सज़ा मिली है कि अब तुम्हारा घर 40000 वर्ग किलोमीटर से घटा कर 10000 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया है जिसमें तुम शिफ्ट किए जा चुके हो। आज पढ़ा कि तुमने कुछ खाया नहीं, जिसका एक पल में घर उजाड़ दिया गया हो उसके गले निवाला उतर भी कैसे सकता है भला!

रणथम्भोर से उदयपुर के सज्जनगढ़ पार्क तक का बेहोशी का सफ़र भले तुम्हें याद ना हो लेकिन उस बेहोशी में तुम्हें 'नूर' का ख्याल तो आया ही होगा। वही नूर जो अपने दो शावकों के साथ अक्सर तुम्हारे साथ दिखती थी। शनिवार सुबह भी तुमने एक साथ शिकार खाया था। उस्ताद शायद तुम्हें पता नहीं लेकिन वो रविवार से तुम्हें ढूंढ रही है। जहां से तुम्हें बेहोश कर सज्जनगढ़ ले जाया गया वो मगरदेह नाम की उस जगह भी गई, काफी देर तक कुछ सूंघती रही पर तुम्हारा कोई सुराग नहीं लगा पाई वो बेचारी!

तुम्हें एक राज़ की बात बता दूं 'उस्ताद'? तुम बहुत अच्छी किस्मत लेकर पैदा हुए कि कोई सरकारी गोली तुम्हारी खोपड़ी में नहीं घुसी!! क्योंकि तुम्हें खूंखार घोषित किया जा चुका है।

बस आश्चर्य तो ये है कि जिसे तुम्हारी सुरक्षा का ज़िम्मा दिया गया वो 'मंत्री' कह रहे हैं कि कुछ 'टेक्निकल' कारण हैं जिनकी वजह से तुम्हें वहां शिफ्ट किया गया है और वो 'टेक्निकल कारण' मुझसे ज्यादा तुम जानते हो क्योंकि तुम अब तक वहीँ 'टूरिस्ट टेररिज्म' की कैपिटल बन चुके रणथंभौर में रहे हो। तुमने घर बचाने की कोशिश क्या की उन्होंने तुम्हारा घर ही उजाड़ दिया, खासकर उन्होंने जो कभी अपना 'घर' भी न संभाल सके।

खैर! अब तुम उदयपुर के सज्जनगढ़ पार्क में शिफ्ट हो चुके हो,छोटे से घर में। वहां इन बेवफा लोगों ने किसी 'दामिनी' को तुम्हारे लिए छोड़ा हुआ है,कोशिश करना वहां के जैसे होने की क्योंकि तुम्हारे पास कोई आप्शन भी नहीं है शायद! और हां मेरी सॉरी एक्सेप्ट मत करना प्लीज! वरना हम लोग तेरी नूर को भी कहीं दूर भेजने में वक़्त नहीं लगाएंगे। हां, हो सके तो किसी जंगल के कोर्ट में अपील कर दो शायद तुम्हें न्याय मिले!





Friday, 8 May 2015

मतलब किडनी की बीमारी बुखार की गोली से ठीक कर रहे थे मेरे पापा...

पता है माधव जी, मेरे पिताजी इतनी बीमारी में भी इतने मजबूत थे कि किडनी-सिडनी सब खराब है फिर भी कह रहे हैं कि ला यार एक कॉम्बीफ्लेम दे दे, बुखार सा हो रहा है। मतलब किडनी की बीमारी बुखार की गोली से ठीक रहे थे। पर हमें पहले तो पता ही नहीं चला, साले डॉक्टरों ने बताया ही नहीं कि उनकी बॉडी में अंदर कुछ बचा ही नहीं है। पता चला तब तक तो बहुत देर हो गई थी। मेरे लिए भटूरे बनाते-बनाते अर्जुन अपने पिता की मौत की कहानी सुना रहा था आज सुबह।

अक्सर सुबह 10 बजे के आस-पास जोरों की भूख लगती है तो अर्जुन के छोले-भटूरे की रेहड़ी पर चला जाता था। 15-20 दिन से वो दिख नहीं रहा था, आज दिखा तो सिर पर छोटे-छोटे बाल उगे थे। मैंने पहले वाले अंदाज में ही पूछ लिया, मुझे तो लगा अर्जुन महाभारत लड़ने गया है। हां, भाई महाभारत ही लड़ रहा था, हार कर आया हूं। पिताजी खत्म हो गए। ओह! बस एक ही तस्वीर आंखों के सामने आई, मैं उनका पहला ग्राहक हुआ करता था और वही चेहरा भटूरे तलने के लिए कढ़ाई में तेल डालता था। कैसे? अरे! बॉडी में कुछ बचा ही नहीं था उनके। मतलब गुर्दे, किडनी सब खत्म...। हम थोड़ा लापरवाही में ले गए और डॉक्टर भी। एसएमएस (राजस्थान का सबसे बड़ा अस्पताल) में ले गए, एक्स-रे किया और कहा कि सब ठीक है, मैंने कहा कि डॉक्टर साब ये पेट में दर्द बताते हैं। फिर डॉक्टरों ने बड़ी जांचें की तो पता चला। आईसीयू में भर्ती किया, सबको लगा कि ठीक हो जाएंगे, डॉक्टरों को भी। लेकिन पेशाब रुक गया उनका, नली डाली तब पेशाब गए। लेकिन रात में सब गड़बड़ हो गया, डॉक्टर बोले, अस्पताल में रखोगे तो कुछ घंटे ज्यादा ही जी पाएंगे बस, हम उन्हें घर ले आए, डॉक्टरों ने 4 घंटे के लिए बोला था लेकिन 10घंटे जी गए मेरे पापा! सबसे आंख मिलाईं औऱ रात के 1.30 बजे चले गए। 17 अप्रैल को। हां, पर दुकान के व्यवहारियों ने बहुत हैल्प की, सारे के सारे पहुंचे थे, यार, ये नहीं पहुंचेंगे तो कौन पहुंचता फिर? शर्मिंदा सा होते हुए मैंने ये बोला था क्योंकि मैंने तो किसी से पूछने की कोशिश भी नहीं की कि अर्जुन क्यों नहीं आ रहा?

अर्जुन रेहड़ी पर अपना सामान सजाते हुए सब बता रहा था और मैं बाइक पर बैठे-बैठे पता नहीं कैसे सुन पा रहा था। तो यार! यहां तो ठीक दिखाई देते थे, हां माधव जी! उन्होंने हमें पता ही नहीं चलने दिया, 60 के ही थे बस। पर मेरे पापा थे बहुत मस्त और दिलेर आदमी। अर्जुन की आवाज में रुलाई नहीं थी पर उसका मन अस्पताल के उस बेड पर था। कढ़ाई साफ करते हुए बोल बैठा, पापा करते थे इसे साफ...।  9 बजे वो आते थे और 10बजे मैं। तब तक सब तैयार मिलता था मुझे, कढ़ाई साफ, 2 बाल्टियों में पानी, रेहड़ी के ऊपर तिरपाल सब तैयार, चाय भी। मेरे आते ही चाय पिलाते। मैं तो सिर्फ भटूरे निकालता था, आपके लिए। अाज थोड़ा लेट हो गया हूं आप आधे घंटे में आ जाइए।

अच्छा कहकर मैं वापस ऑफिस आ गया। एक घंटे बाद गया तब अर्जुन चाय बना रहा था, अपने और आसपास के रेहड़ी वालों के लिए। बगल की दुकान वाले भी एक अंकल आ गए, अर्जुन अपने पिता की मौत का अब मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कर रहा था, उन शख्स से बोला (नाम भूल गया उनका) 15-20 साल बाद जब आप ऊपर जाएं तो पता करना आदमी मरके कहां जाता है? इस सवाल में शायद अर्जुन अपने पिता को ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था। वो अंकल दार्शनिक होकर बोल रहे थे, ये पता चल जाए तो आदमी वहां भी पहुंच जाए, धंधा करने। अंकल हंस दिए, मैं भी पर अर्जुन ने इस बात पर क्या पता की तरह हाथ घुमाया। पहले पुड़ी जैसे दो भटूरे निकाले, एक भगवान को चढ़ाया औऱ दूसरा भट्टी को, पहले की तरह ही फिर मुझे थाली दे दी।

पहले की तरह ही अर्जुन सब काम कर रहा था, वैसी ही बात, वैसा ही स्वाद और वैसा ही व्यवहार पर अपनी कमी वो पैसों की पेटी में लगी अपने पिता की पासपोर्ट साइट फोटो में पूरी कर रहा था, पैसे देते वक्त वो फोटो मुझे दिखाई दिया...

Thursday, 30 April 2015

त्रासदी की कहानी, स्थानीय पत्रकार की जुबानी

हर रोज की तरह मैं अपने साथियों के साथ विश्व दर्शन अभियान के ऑफिस में बातचीत कर रहा था, तभी जोरदार झटका लगा। बाहर आकर देखा तो मंजर अलग ही था, वो सब उजड़ चुका था जिसे कुछ देर पहले ही मैं निहार कर अंदर घुसा था। बर्बादी का ऐसा मंजर आंखों के सामने था जिसकी कल्पना भी संभव नहीं, लेकिन वो घटित हो चुका था। माहौल इतना डरावना कि सब स्तब्ध।

बदहवास से लोग खुले आसमान की तरफ भाग रहे थे। सिर से निकलते खून पर हाथ रखकर मैं भी भागा और एक खुली जगह पर सैंकड़ों लोगों के साथ खड़ा हो गया। लगातार आ रहे आफ्टर शॉक हमें हिला रहे थे, हम हिल रहे थे, बाहर से भी और अंदर से भी।

चारों तरफ चीत्कार और क्रंदन की आवाजें ही सुनाई दे रही थींं। फिर एक अजीब से सन्नाटे में सुन पा रहे थे तो सिर्फ सायरनों की आवाजें। शाम होते-होते भूकंप की गंभीरता का अंदाजा हुआ। रात 12 बजे तक वहीं कहीं खुली जगह में बैठे रहे। हिलती-डोलती धरती के बीच ही सुबह हुई। उस हादसे का भयानक मंजर अगली सुबह दिख रहा था। सब कुछ मिट्टी में मिला हुआ।

अस्पतालों के बाहर लाशें और अपनों को ढ़ूढ़ते कराहते हुए लोग। हमारा गर्व धरहरा पता नहीं कितनी जान अपने आगोश में लिए जमींदोज हुआ पड़ा था। दहशत से भरे हुए सैंकड़ों लोग इसी धरहरा के पास खाली पड़ी जमीन पर शरण लिए हुए थे। दूसरे दिन भी मैं और हमारे साथी काठमांडू के शांतिनगर और धरहरा के पास इसी खाली जमीन पर रहे। यहां लोगों में दहशत इस कदर बैठ गई है कि जिनके मकान सुरक्षित भी हैं वो अंदर नहीं जा रहे। मंगलवार तक चार दिन हो गए लेकिन जमीन अभी भी हिल रही है। सोमवार रात 9.30 बजे ही झांपा में 4.0 रियेक्टर के झटके महसूस किए गए। नेपाल के 75 जिलों में से 27 बुरी तरह इस जलजले से प्रभावित हुए हैं। लेकिन इस मुश्किल घड़ी में जिस तरह से भारत सरकार और इंडिया के लोग हमारे साथ खड़े हुए हैं, उसके लिए उनका तहेदिल से शुक्रिया।

जैसा कि फैडरेशन ऑफ नेपाली जर्नलिस्ट के सदस्य नारायण भट्टराई ने बताया।