Monday, 1 August 2016

राजा की भैंस, भैंस होती है प्रजा की सिर्फ जानवर!

उसके बाल लगभग सफेद हो चुके हैं। घनी-तीखी मूछें भी आधी पक चुकी हैं। बांए हाथ में वही पुराने जमाने की झक पीले फीते की घड़ी। आधी बांह के जेबदार बंडी (बनियान) इसलिए दिख गई क्योंकि उसने कुर्ता उतार कर अपने आगे की सीट पर लटकाया हुआ था। मैली सी धोती और पैरों में रबर के जूतों से समझ में आ गया था कि वो एक सामान्य सा किसान आदमी है।
नए बने हाइ-वे पर फर्राटे से दौड़ रही रोडवेज बस में मैंने अपनी सीट ले ली। बैठते ही वो बंडी वाला आदमी मुझसे बात करना चाह रहा था लेकिन शायद हमारे कपड़ों का अंतर ही था जो उसे अपनी बात कहने से रोक रहा था।
मैंने ही सामने से पूछ डाला, बाबा खां जागो? मेरे इस वाक्य ने मानो उसके किन्हीं ज़ख्मों को कुरेद डाला हो। उसका चेहरा देखकर लग रहा था कि उसे यह लगा मानो मैं ही वो दुनिया का इकलौता इंसान हूं जो उसकी समस्या को उसी की भाषा में समझ कर तुरंत हल कर देगा। मेरे यह पूछने पर कि बाबा खां जागो ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की निज भाषा उन्नति अहे, सब भाषा कौ मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय के शूल को सही साबित कर दिया। उसे समझ आ गया किमैं लोकल ही हूं लेकिन नौकरी के लिए किसी शहर में रह रहा हूं। 

उसने अपनी पीड़ा का पिटारा खोल दिया जिसे वह अपनी किस्मत मान रहा था लेकिन मुझे समझ आ गया कि ये किस्मत नहीं सिस्टम का मारा हुआ था। आगे की सारी बात खड़ी ब्रज बोली में हुई लेकिन मैं उस बातचीत को हिंदी में लिख रहा हूं। 

मेरी भैंस चोरी हो गई हैं, महीनाभर हो गया लेकिन कहीं पता नहीं चल रहा। 4 भैंस थीं 3 लाख रुपए की। सब जगह ढूंढ़ लिया लेकिन नहीं मिली। रिश्तेदारों से कुछ सुराग मिला है कि मदनपुर के पास किसी गांव में गूजरों का काम है ये। पुलिस में रिपोट लिखाई पर कुछ नहीं हुआ। महीनेभर से भाग रहा हूं। 15-20 गांवों में जाकर आ चुका हूं। जो जहां बताता है वहीं जा रहा हूं। 3 लाख की भैंस थीं और ढूंढ़ने में में 40-50 हजार खर्च कर दिए हैं। 2 अभी ब्याई थीं, एक चौमासे में ब्याती और एक बाखरी (सालभर से दूध देती हुई) भैंस थी। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते कर्जा हो गया और धन-धरम से गए सो अलग। 

3 साल से अकाल है, खाने के लाले पड़े हैं। दूध बेचकर पेट पाल रहे थे। थक हार कर देवता से पुछवाई तो उसने बताया कि डांग एरिया में हैं भैंस मेरी। चोर गूजर हैं और मैं जोगी हूं, मिल भी गई तो बिना पइसा के वापस नहीं देंगे। इतना कह कर उसने मुंह बस की खिड़की की ओर फेर लिया। धंसी हुई आंखों से गिरा आंसू उसकी उन तीखी सी मूंछों में कहीं अटक गया।  

तो फिर क्यों जा रहे हो? मैंने पूछा तो बोले, देख भायले (दोस्त)  पता तो है मुझे कि कहां गई हैं मेरी भैंस और जिसने चुराई हैं उसने भी अपने रिश्तेदारों के यहां भेज दी हैं पर मुझे सुराग लगा है कि बाखरी भैंस अभी भी उसके पास है। मांग के देखूंगा अगर दे देगा तो। कुछ पैसे ले लेगा और क्या। आखिर में वो मुझसे जयपुर में नौकरी लगवा देने की बात कह कर एकदम शांत हो गया।

लेकिन जिस वक्त वो अपनी भैंस चोरी की कहानी सुना रहे थे मेरे जेहन में तुरंत आजम खान की भैंसों का ख्याल आया। राजा की भैंस, भैंस होती है और प्रजा की जानवर! राजा के लिए पूरा सिस्टम लग जाता है तो प्रजा खुद ही अपना सिस्टम डवलप करती है। देवी-देवताओं से पूछती है, रिश्ते-नातेदारों से पता करती है और वो सब करती है जो राजा कभी नहीं करता। कहने को लोकतंत्र है लेकिन जिस जाति का जहां वर्चस्व है वो वहां उतनी ही सामंती भी है। वह जानता है कि उसकी भैंस कहां हैं लेकिन वापस भी मिलेंगी तो पैसे देकर। हमारा आम आदमी रोज ऐसे ही जीता है। रोता भी है तो मुंह दूसरी तरफ फेरकर। इन तकलीफों और संघर्षों पर कोई डिबेट खड़ी नहीं होगी क्योंकि हम सब को इन्हें देखने की आदत बंद करवा दी गई है। हालांकि आप और हम जानते सब हैं लेकिन राजनीति ने हमें अपनी नजरें दे दी हैं। हम वही देखते हैं जो राजनीति हमें दिखाना चाहती है। कभी गाय तो कभी बीफ, कभी हिंदू तो कभी मुसलमान। कभी दलित तो कभी सवर्ण। कभी राष्ट्रवाद तो कभी देशद्रोह। आप और हम हर वक्त इस्तेमाल किए जा रहें हैं और हम बिना सोचे-समझे रोजाना इस्तेमाल हो भी रहे हैं।

Friday, 22 July 2016

एक टूटी-फूटी बाखरों वाला गांव

कई लोगों ने मुझसे पूछा है कि बाखर का मतलब क्या है और मेरे ब्लॉग का नाम मेरी बाखर क्यों है? हालांकि जब मैंने ये ब्लॉग शुरू किया तब भी मैंने लिखा था कि ब्लॉग का नाम ये क्यों है। आज थोड़ा सा फिर से लिख रहा हूं। इस गांव को देखकर ही ब्लॉग का नाम ये रखा था। कई महीनों बाद ये फोटो खींचा। इस फोटो को मैं ढूंढ़ भी रहा था और कल अचानक लैपटॉप के एक फोल्डर में यह मिल गया।

देखते-देखते विचार आया कि एक गांव में क्या हो कि लोग वहां आराम से रह सकें। हम अर्द्ध शहरी हो चुके लोगों के अवचेतन में गांव की तस्वीर क्या है? यही कि गांव में चारों तरफ हरियाली है। एक तरफ नदी बह रही है, दूसरी ओर खेत लहलहा रहे हैं। पगडंडियां हैं। सभी लोग एक-दूसरे की मदद से सौहार्दपूर्वक रहते हैं और वहां दूध-घी की कमी नहीं है। कुछ-कुछ ऐसी छवि जो 50-60 के दशक से फिल्मों ने बना दी है।

ये गांव आज भी कुछ ऐसा ही है जैसा आपके-हमारे अवचेतन गांवों को लेकर छवि है। किनारे से बह रही नदी है। लहलहा रहे खेत भी हैं। मवेशी भी। विकास को दिखाता नदी के ऊपर बना हुआ पुल है, सफेद दुपट्‌टा ओढे एकदम काली चमचमाती सड़क है। लेकिन नहीं हैं तो बस इस गांव में रहने के लिए लोग। बरसों पहले ही गांव खाली हो चुका है। पूरा गांव छोड़कर लोग दूसरे कस्बे में जा बसे हैं। एकाध सरकारी नौकरी में गए तो अधिकतर ने ऐसे ही काम-धंधों में जिंदगी गुजार दी।

अब ये गांव वीरान है, एकदम सुनसान। दिन में भी झींगुरों की आवाजें सुनाई देती हैं। फोटो में जो कुछ दिख रहा है यही वो बाखर हैं जो अब टूट चुकी हैं। कभी मिट्‌टी के तेल के चलने वाले लैंप से भी जगमग रहने वाले इस गांव में आज बिजली का छोटा सब-स्टेशन है फिर भी यहां अंधेरा है। पीने के पानी के लिए बड़ी टंकी है लेकिन इसका फायदा कई दूसरे गांव ले रहे हैं। पक्की सड़क है लेकिन गांव में कोई नहीं रुकता। ये कच्चे घर तो क्या 30 साल में ही पक्की हवेलियां भी टूट-फूट कर भूतहा सी बन गईं। कितने निष्ठुर से हो गए हैं वो लोग जिनका बचपन इन बाखरों में गुजरा था। कभी मुड़कर भी नहीं देखते इनकी तरफ। ये इंतजार में तकती रहती हैं और एक दिन थककर भरभरा कर गिर पड़ती हैं अपने अतीत को दबाते हुए। 


दिल दुखी तो होता है लेकिन गुजरे वक्त को सिर्फ याद करना चाहिए उसमें रहना नहीं चाहिए। ये बात गुलजार साहब ने कही थी इस बार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में। हां यह सही है कि अब इन बाखरों में पहले जैसी चहल-पहल कभी नहीं हो पाएगी लेकिन जब इन्हें कोई मेरे जैसा इंसान देखता है तो इन्हें खुद में समा लेने की कोशिश करता है। मैंने भी वही किया है इसे अपने ब्लॉग का नाम देकर। 


Saturday, 9 July 2016

एक प्रवासी के लिए बरसात

रात के तीसरे पहर से लगातार बारिश हो रही है। सन्नाटे की इस रात में मेंढ़कों की टर्र-टर्र के अलावा पहाड़ियों से गिरते झरनों की सुंदर सी आवाज आ रही है। जैसे ही आवाज कम होती है पहाड़ी के पीछे से तेज गड़गड़ाहट से बिजली चमकती है। बिजली के चमकते ही मोर गाने लगते हैं। एक कोने से शुरू हुई गाने की आवाज भोर होते-होते चारों कोनों से आने लगती है। चाकी पर घर की सास कुछ पीसते हुए गीत गा रही है। अब सुबह हो गई। सब कुछ धुला हुआ है। गाएं रंभाती हुई हर चौखट से रोटियां लेती जा रही हैं। गांव का हर कच्चा रास्ता पानी से लबालब है। चाय पीकर हल्के उजाले में ही औरत और मर्द खेतों की ओर निकल गए हैं। खेत में पहुंचते ही धानी बोने की तैयारी होने लगी है। महिलाएं अच्छी पैदावार होने के गीत गाती जा रही हैं और पहले से जुते हुए खेतों में धानी बोने में मदद कर रही हैं। सावन भी आने वाला है तो महीनेभर पहले ही बेटियां पीहर आ चुकी हैं।
खेत की मेड़ पर लगे आम के पेड़ में सावन की गीतों पर झूला भी झूम रहा है। दिनभर अपनी तरह की मेहनत कर शाम को सब घर लौट आए हैं। गाएं भी रंभाती हुई हर चौखट से रोटियां लेकर वापस जा रही हैं। मंदिर में घंटियां बजने लगी हैं। मंदिर के चबूतरे पर हुक्का लिए बुजुर्ग रसिया (लोक-गीत), पौराणिक कहानियों पर वाद-विवाद, फलाने की बारात, ढिकाने की बेटी के ब्याह की बात करने लगे हैं। किशोर उम्र के लड़के बार-बार अंदर चौके में जाकर हुक्के में तंबाकू भर लाते हैं और एकाध गुड़की खुद भी लगा लेते हैं। रात के 10 बज जाते हैं। सब सोने चले जाते हैं। अगले दिन फिर यही सब होता है।

बरसात में गांव स्वर्ग होते थे, अब नहीं होते। एक कोने से मोर गाते जरूर हैं लेकिन सुबह होते होते दूसरे कोनों से ट्रेक्टरों के गर्राने की आवाजें आने लगती हैं। अब न चाकी पर कोई गीत गाता है न महीनेभर पहले बेटियां पीहर आती हैं। आमों पर झूले भी कम डलते हैं। मंदिर के चौतरे पर 10 बजे तक बैठने वाले गुजर गए। न कोई रसिया गाता है और न ही कोई अब हुक्का पीता है। बारातों की तैयारी तो अब सिर्फ घर के लोग ही करते हैं। कच्चेे घर की पाटौर के नीचे वो दिन अब नहीं आएंगे ये कहते हुए बंगलौर से आए रमझू मामा ने मोजे उतारे और शीशम की लकड़ी से बनी खाट पर सो गया।

#एक_प्रवासी_की_बरसात

Monday, 20 June 2016

12 साल का बच्चा आत्महत्या क्यों करना चाहता है?

गोलमटोल से चेहरे का वो बच्चा बेहद मासूम और खुरापाती है। गोलाई में कटे हुए बाल, नाक के ठीक नीचे छोटा सा तिल और हर बात पर मटकती उसकी आंखें दिखा रही थीं कि भले ही वह 12 साल का है लेकिन हरकतें 7 साल के बच्चे सी हैं। कुछ समझ में आए या ना आए हर बात में बोलने से लग रहा था कि ये वाचाल बच्चा बाकियों से कुछ तो अलग है। फोन में गाना बजा और वो ठुमकने लगा। तभी दरवाजा खुला, कैफरी पहने एक लड़के ने आंखे दिखाते हुए बिना कुछ देखे-सोचे बच्चे के सिर में जोर से थप्पड़ मारते हुए कहा, सारे दिन चिल्लाता क्यों रहता है, पढ़ाई-लिखाई का कोई काम नहीं है क्या? वो उसका बड़ा भाई था। बच्चा मुंह लटकाए डबडबाई आंखें लिए चुपचाप टेबल पर ही बैठ गया। लड़का शर्ट पहनकर कहीं चला गया। अब कमरे में हम दोनों ही रह गए थे। उसके जाते ही वह फिर से उसी तरह ठुमकने लगा। 

मैंने पूछा, डांस करना पसंद है क्या? नहीं। तो क्या पसंद है? उसने कहा, पढ़ना। पढ़ाई तो सब करते ही हैं, पढ़ने के अलावा क्या करना अच्छा लगता है? उसने थोड़ी झिझक खोली और बोला, क्रिकेट। तो खेलता क्यों नहीं? हाथों से ही क्रिकेट खेलते हुए उसने जो जवाब दिया उस जवाब का कोई मनोवैज्ञानिक विश्लेषण तो होना ही चाहिए। 

वह बोला, पापा के सपने को पूरा करने के बाद अपने सपने पूरा करूंगा। पापा का सपना क्या है? मैंने पूछा। वो मुझे आईएएस बनाना चाहते हैं, उसने कहा। मैंने फिर पूछा, आईएएस बनने में तो काफी उम्र निकल जाएगी तेरी, फिर क्रिकेट कब खेलेगा? तभी जब आईएएस बन जाऊंगा, भले ही 35 साल का हो जाऊं। बनने के बाद ही खुद की पसंद के काम करूंगा। अगर आईएएस न बन सका और उम्र भी निकल गई तो क्रिकेट में भी करियर बनाने से रह जाएगा तू, तब क्या करेगा?

इस बात के उसके जवाब ने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए। मेरी डरी हुई आंखें उसकी मटकती हुई आंखों में देख रही थीं कि उसे अपने इस जवाब पर इस कदर विश्वास था और अगर ऐसा हुआ तो वो ऐसा कर भी लेगा। उसने अपने घुटने को तबला बनाकर उसपर उंगलियों को खिरकाते हुए बहुत ही आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, तब मैं सुसाइड कर लूंगा। मरने के अलावा मेरे पास कोई और ऑप्शन भी नहीं होगा तब। अगर आईएएस नहीं बना तो पापा को क्या जवाब दूंगा और बन गया तो मुझे लगेगा कि मैंने अपने पापा के लिए कुछ किया है। 

जवाब सुनकर मैं स्तब्ध था। इतना ही याद आया और उसे सुना दिया कि ‘आत्महत्या एक टेम्पररी प्रॉब्लम का परमानेंट सॉल्यूशन है’। उसने हां में सिर हिलाया पर ऐसा बिलकुल नहीं कहा कि मैं ऐसा नहीं करूंगा। मैं यही सोच रहा था 12 साल के बच्चे में आत्महत्या करने की बात कैसे घर कर गई? ये सपना उसपर 6 साल की उम्र से ही थोप दिया गया था और इसे साकार करने के लिए कोटा भी भेज दिया गया। 

अब छुट्‌टियां चल रही हैं वो स्कूल भी नहीं जा रहा लेकिन वह जयपुर में अपने उस भाई के साथ रह रहा है, बिना किसी काम के, एक ऐसे मकसद को लिए जो पता नहीं शायद सच भी न हो। मैं चाहता हूं सच हो जाए। उसे उसकी बना दी गई मानसिकता से िनकालने की मेरी कोशिश नाकाम रही कि अभी वो िसर्फ 12 साल का है। स्कूल में पढ़ रहा है। कुछ बनने का ख्वाब 10-12वीं क्लास के साथ या बाद आते हैं पर वो शायद यह बात मानने को तैयार नहीं। 6 साल की उम्र से वो आईएएस बनने का सपना ढो रहा है और शायद ढोता रहेगा। मां-बाप ने उसकी शैतानियों से परेशान होकर यहां भेज दिया लेकिन उससे बात करके मुझे लगा कि वो यहां घुट रहा है अंदर ही अंदर मर रहा है। कुछ सपने जो इसके नहीं हैं उनके लिए परेशान हो रहा है। जिम्मेदार कौन है इसके लिए????

Friday, 10 June 2016

अग्रवालो क्या इस फैसले में आपकी भी सहमति है?


कल यह खबर पढ़कर हैरान रह गया। एक बारगी विश्वास ही नहीं हुआ कि खुद को पढ़ा-लिखा और सबसे आगे बताने वाले इस समाज के कुछ लोग मानसिक रूप से इतना पिछड़े भी हो सकते हैं। खुद को ज्यादा कनेक्ट इसीलिए कर पा रहा था क्योंकि यह खबर मेरे गृह जिले धौलपुर से है।

हालांकि इसमें पूरे समाज की मर्जी शामिल नहीं है लेकिन उन लोगों के मुताबिक फैसला जिलेभर से पूरे समाज के लोगों ने लिया है। हुआ यह है कि अब धौलपुर जिले में अग्रवाल समाज की महिलाएं बारातों में होने वाली निकासी में नहीं नाचेंगी। ये फरमान समाज के लोगों ने मीटिंग कर लिया है। 


समाज की बनी हुई समिति ने पूरे जिले से पदाधिकारी बुलाए, करीब 60 लोग आए इनमें सिर्फ 4 महिलाएं थीं और एकमत से पारित कर दिया कि निकासी में अग्रवाल समाज की महिलाएं डांस नहीं करेंगी। ताज्जुब है कि महज 60 लोगों ने एक जगह बैठकर पूरे जिले की महिलाओं के बारे में खाप पंचायतों जैसा फैसला ले लिया। मेरी याद में तो खाप ने भी कभी महिलाओं के नाचने पर पाबंदी नहीं लगाई। आप लिखते हैं कि बैठक में समाज सुधार, कुरीति-कुप्रथा मिटाने जैसे कई निर्णय लिए गए। लेकिन इस फैसले से आपने कौनसा समाज सुधार या कुरीति मिटाई? बल्कि एक बुराई की शुरुआत ही की है। 



हो सकता है कि आपमें से बहुत लोग यह कह कर मुझे गरिया दें कि ये किसी समाज का अपना मसला है लेकिन बुरी शुरुआतें कहीं से भी शुरू हो सकती हैं और धीरे-धीरे वो समाज के उस तबके को अपनी जद में ले लेती हैं जो चाहकर भी इन बुराइयों से फिर दूर नहीं हो पाता। दहेज इसका जीता-जागता सबूत है। पैसे वालों ने इसे शुरू किया और आज गरीब अादमी अमीरों के शुरू किए इस फैशन का शिकार है। वो लड़की की शादी के लिए घर से लेकर खेत तक को कर्ज में डूबो देता है।

अपने फैसले में आपने कहा, निकासी के वक्त असमाजिक तत्वों से समाज की महिलाओं को खतरा रहता है। ठीक है लेकिन इसमें महिलाओं की क्या गलती है, ये दिक्कत तो उन लोगों की है ना जो गलत हरकतें करने की मानसिकता वाले हैं।
-       लिखा गया है कि इस फैसले का कड़ाई से पालन किया जाएगा और निगरानी भी रखी जाएगी। अगर फैसले को कोई नहीं मानता तो क्या आप उस पर कोई जुर्माना लगाएंगे या उसे समाज से बाहर कर देंगे?
-       आप ऐसे तुगलकी फरमान देकर क्या महिलाओं के लिए एक सीमा तैयार नहीं कर रहे, महिलाएं वही करें जो आप कहें। क्या धौलपुर जिले की महिलाओं ने खुद के सारे फैसले आप पर छोड़ दिए हैं या वो कहां नाचें और कहां नहीं ये तय करने के लिए उन्होंने आपको चुना है? 

अंत में एक बात आप महिलाओं से कहना जरूर चाहंूगा, क्या ये फैसला आप ऐसे इंसानों पर छोड़ना पसंद करेंगी जिन्हें आप जानती भी नहीं और वो आपसे कहंे कि आप यहां नाचिए और यहां नहीं। क्या आप चाहेंगी कि आज जिन लोगों ने आपको डांस करने से मना कर दिया वही लोग कल आकर यह भी कह दें कि शादी में आपको ऐसे कपड़े पहनने हैं, ऐसे नहीं? (ऐसा हो भी सकता है समाज सुधार के नाम पर)। क्या आप इन लोगों से यह पूछना नहीं चाहेंगी कि उन मर्दों का क्या जो आपके ही आगे इन्हीं बारातों में शराब पीकर आपस में अश्लील डांस करते हैं? या आप इसे महज अपने समाज का अंदरूनी मामला मानकर चुपचाप रहेंगी? 

Friday, 3 June 2016

मैं शर्मिंदा था...

सिलेंडर ख़त्म हो गया है भैया, खाना पैक करवा लाना। घर से ऐसा फ़ोन हर तीसरे महीने अक्सर आ जाता है। आज भी वही दिन था और मैं भी हर बार की तरह उसी शर्मा होटल पर मिक्स वेज और रोटी पैक करवाने पहुंचा। देखा, होटल के बाहर लगी टेबल पर लंबा और मैल से सने हुए सफ़ेद धोती-कुर्ता पहने एक बूढ़ा खाना खा रहा है। 
आर्डर देकर मैं बाहर इंतज़ार करने लगा। लेकिन मेरी निगाह उस बूढ़े पर फिर से जा टिकी। अरे! ये तो वही है जो हर दिन इसी सड़क हर किसी के आगे हाथ फैलाता है। ढावे पर उसे खाता देख आश्चर्य हुआ, इसकी हैसियत तो नहीं है 60-70 रुपए देने की फिर भी होटल अफोर्ड कर रहा है। दिमाग में तमाम बातें एक साथ आने लगीं। एक पुलिस वाले ने कहा था बहुत पहले, माधव जी इनका गिरोह चलता है, वही खाना-पीना और रहना देते हैं, दिनभर की कमाई वो इनसे छीन लेते हैं। मैं अक्सर सड़क पर किसी को पैसे नहीं देता पर कभी कोई बेबस  सी औरत मासूम सा बच्चा लेकर हाथ फैलाती है तो शर्म के मारे कभी दे भी देता हूं। 

इसे ढाबे पर खाता देख मैं तय कर चुका था कि आज के बाद मैं वो शर्म भी नहीं करूंगा और भी ना जाने क्या-क्या दिमाग में चलने लगा। वो कुर्सी पर पालती मार दाल फ्राई में तंदूरी रोटी गला-गला कर खाता रहा। मेरा खाना भी पैक हो गया और उसका खाना पूरा हुआ। मैंने पैसे दिए और एक हल्की सी आवाज सुनी। उस बूढ़े और काउंटर के बीच में मैं खड़ा था और वो आवाज उसके हाथ में खनकते सिक्कों की थी। बैठे हुए गले से उसने मुझे कहा, देना! मैं स्तब्ध था। मेरा हाथ बढ़ा, उसके हाथ से वो सिक्के लिये, कुछ पल मेरे हाथ में खनके वो सिक्के मैंने काउंटर पर रख दिए। 5 सेकंड के इस समय में कुछ पल वो दाता था और मैं उसके आगे हाथ फैलाता हुआ भिखारी! 

लड़के ने 1-2 रुपए के सिक्के गिने, 20 रुपए थे। उसने थोड़ी ऊंची आवाज में कहा, और दे। बूढ़े ने बाएं हाथ में छुपाए सिक्के दाएं हाथ में लिए और फिर से मुझे पकड़ा दिए। मैंने फिर उन्हें काउंटर पर रख दिया।लड़का फिर बोला, 5 रुपए की एक रोटी है, तूने 3 खाई तो 15 हुए और 30 रुपए की दाल है। 45 रुपए हुए टोटल समझा। ये 30 ही हैं। बूढ़े ने उस लड़के और मुझसे नज़र मिलते हुए अपने मैले कुर्ते की जेब झड़का दी। ढाबे का मालिक मुस्कुरा रहा था। उसने सिक्के अपने हाथ में लिए और गल्ले में डाल दिए। बूढ़ा खिसियाई सी हंसी देकर उठ गया और लंगड़ाता हुआ वो फ्लाईओवर के नीचे पहुंच गया, इठलाता हुआ ढाबे का वो लड़का खाना सर्व करने लगा और मैं खुद पर शर्म करता हुआ अपनी स्कूटी पर आ बैठा।

आज के दिन ने बहुत अनुभव दिए हैं पर इसे साझा किये बिना रह नहीं सका।

Tuesday, 26 April 2016

Nostalgia: बचपन, स्कूल, खेल और छूटा हुआ वो सब

मां ने सुबह-सुबह नहला कर तैयार कर दिया है। सिर में आंवले का तेल और आंखों में रात में जले दीपक से चमचे में बना देसी काजर (काज़ल) भर दिया है। मैं हाथ छुड़ाकर जाने की नाकाम कोशिश कर रहा हूं लेकिन मां तब तक नहीं छोड़ती जब तक वो अपनी उंगली में लगा बाकी काजर मेरे माथे पर न दे। मैं हाथ छुड़ाकर कीचड़ और गोबर भरी गली में ऐसे भागा मानो मां ही मेरी जीत में सबसे बड़ी दुश्मन है। पीछे से कानों में आवाज़ आ रही है, धीरें जा नैं तौ गिर जागौ.... भाग रहा हूं इसीलिए कि स्कूल में पढ़ने से ज्यादा, जाने में मजा आता है। 


मोहल्ले के 10-15 मेरे जैसे नौनिहाल रास्ते में हर चीज (गोल-मटोल सा पत्थर, बोतल या कुछ भी जिस पर दिल आ जाए) को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए ठोकरों से उसकी पहले से निर्धारित मंजिल तक पहुंचा रहे हैं। आखिरकार उसकी मंजिल आ गई, स्कूल के बड़े से दरवाजे के किसी कोने में उस चीज को सुरक्षित रख दिया गया है लेकिन वो ‘चीज’ जानती है कि उसकी मंजिल ये भी नहीं है, उसे छुट्टी के बाद फिर से सुबह वाली जगह पहुंचना है, क्योंकि उस ‘चीज’ की मंजिल हमारी ठोकर की गलत दिशा ही तय कर सकती है। अब स्कूल पहुंचे हैं, इमली के पेड़ के नीचे प्रेयर हो रही है, हमारा ध्यान इमली बीनने पर ज्य़ादा है इससे क्लास में स्वीटी सुपारी के साथ खट्टी-मीठी पढ़ाई होगी। लंच टाइम है इसीलिए खुश हूं। जैसे-तैसे छुट्टी हुई, सारे दिन उस चीज के बारे में ही सोचता रहा जो दरवाजे के एक कोने में रखी अपनी मंजिल का इंतज़ार कर रही है। सारे साथी दरवाजे पर खड़े हैं, बिना किसी छल-कपट और बेईमानी के पहली ठोकर वही देता है जिसने सुबह लास्ट ठोकर दी थी, ये तय था। लेकिन...लेकिन सबसे पहले आज सोना-चांदी, होठ लाल करने वाला चूरन, गुरू-चेला, खाने के लिए किसी को पोटना है, किसे? वही जिसे आज क्लास में सबसे ज्यादा शाबाशी या सबसे ज्यादा डांट पड़ी है। अगर कोई नहीं खिलाएगा तो इतनी साख है कि अब्दुल चाचा उधार दे देगें!



उफ्....इस एस्केलेटर को भी अभी खत्म होना था...ये जेडीए वाले दो-चार सीढ़ी और लगा देते तो क्या बिगड़ जाता? कोई नहीं... कोई नहीं... चलो यार अब ऑफिस चलते हैं एक कचौड़ी खा लें पहले......

सचिन तेंदुलकर के नाम मेरा पहला खुला खत

तुम सचमुच लाजवाब हो, दुनिया में तुम्हीं हो, जिसकी बैटिंग के वक्त मेरी मां और बहन सीरियल देखना छोड़ देती थी फिर अगले दिन रिपीट टेलीकास्ट देखती थीं। मुझे याद है, तुम 98 पर खेल रहे थे तभी मैंने कहा कि मम्मी... सचिन 99 पर आउट होगा। ऐसा ही हुआ, खाना खाती हुई मां ने मेरे सिर पर चपेट मारी थी और तुम्हारे आउट होने का पूरा दोष मुझ पर डाल दिया। वो सिर्फ तुम ही थे जिसकी वजह से मेरे 70 साल के दादाजी किक्रेट देखते थे, किसी दोपहर खेत से आते और मैच चल रहा होता और तुम खेल रहे होते तो बोलते, जे का सचिन खेल रौ ए? और खुद भी देखने लग जाते। तुम जब अच्छा नहीं खेलते थे तो चार गाली भी पड़ती थी। मेरी भजन-पूजा वाली दादी की माला भी तुम्हारी बैटिंग के वक्त रुक जाती इसलिए तुम भगवान हुए। तुम ही एकमात्र खिलाड़ी हो जिसका नाम मेरे गांव में बकरी चराने वाले मुश्तू बाबा भी जानते हैं। मुझे याद है कि गांव में बड़े-बुजुर्ग लोग सर्दियों में अलाव सेकते हुए अमेरिका, इंग्लैंड की अधूरी जानकारी के साथ चर्चा करते फिर कुछ बात नहीं बचती थी तो बातचीत राजनीति से खेल पर आकर रुकती। तुम्हारी भी बातें होती पर अंत में बात राजनेताओं, अभिनेताओं और खिलाड़ियों पर होने वाले पैसे पर खत्म होती थी। मैं अपने बचपन और तुम्हारी किक्रेट में जवानी की बात कर रहा हूं। तुमसे मैं कभी नहीं मिला पर अपना जुड़ाव इसलिए महसूस कर रहा हूं कि तुम्हारे लिए मां से छोटे दिमाग (सिर का पिछला हिस्सा) पर लप्पड़ खाया है मैंने!
अब तुम किक्रेट खेलने से इस्तीफा दे रहे हो, अच्छी बात है लेकिन सचिन तुम खेलते रहोगे, मेरी मां के फेवरेट सीरियल आने के टाइम में, दादाजी के साथ खेत में, दादी की भजन माला में। मुश्तू बाबा की बकरियों में, अलाव में जलते हुए आखिरी कोयले पर हाथ सेकते उन बुजुर्गों की ‘इंटरनेशनल’ बातों में। तुम खेलते रहोगे तब तक, जब तक वो लोग जिन्दा रहेंगे जिन्होंने तुम्हें खेलते हुए देखा है।
तुम्हारा
माधव

Saturday, 23 April 2016

गांव का ये खुलापन खुशी दे रहा है

हो सकता है आपके लिए ये सामान्य बात हो, हो सकता है कि ये आपके गैर जरूरी हो। एक बदलाव नज़र रहा है। एक शुरूआत हुई है उम्मीदों भरी। उम्मीद एक निहायत ही गैरजरूरी रीति के टूटने की, उम्मीद एक आजाद ख़्याल समाज के बनने की, उम्मीद अपने से छोटों यानी बेटों खासकर बेटियों की बात और पसंद को तवज्जो देने की और उम्मीद एक ऐसे समाज के उच्च वर्ग के लोगों की सोच बदलने की जो कुछ साल पहले तक लड़की ही नहीं लड़कों के जींस पहनने पर भी रोक लगाती थी।
मैं मेरे घटिया से शहर में तब्दील होते हुए गांव से निकली इस उम्मीद को सच होते हुए देख पा रहा हूं। सुनकर अच्छा लगता है कि हमारी पीढ़ी के बच्चे जिनमें ज्यादातर का बचपन परिवार के बड़ों से अजीब डर में निकला वो इस उम्र पर आकर अपनी पसंद खुलकर उसी परिवार के सामने रख रहे हैं और परिवार भी बिना झगड़े, बिना ज्यादा नाक-नक्श लगाए उन रिश्तों को अपना रहे हैं। यह भले ही शुरूआत भर हो लेकिन जिस सामाजिक चौहद्दी में मेरा गांव और उसके संभ्रांत परिवार आते हैं वहां इस शुरूआत को उनकी कामयाबी कहने को मन कर रहा है जो प्रेम में यकीन रखते हैं। कुछ हो या हो लेकिन इस शुरूआत से दहेज के लिए जो रेट लिस्ट बनीं हैं गांवों में वो कुछ हद तक काबू में होगी, रेट लिस्ट काबू में होगी तो कम से कम लड़की वालों को राहत तो मिलेगी ही वरना जैसे ही कोई रिश्ता लेकर आता है चौराहे पर बैठे फालतू के पटेल हीवहां तो डिमांड हैकहकर ही उसे टरका देते हैं। दूसरा फायदा उन बिचौलियों से होगा जो अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा टास्क किसी की लड़की को अपने नातेदार-रिश्तेदार के लड़के को दिला देना मान लेते हैं वो भी सबसे कम रेट में।
ये अच्छा ऐसे भी है कि ऐसे खुलेपन के माहौल में हमारे पहले की पीढ़ी को खुलकर बात करने और वो शब्द इस्तेमाल करने का मौका मिल जाता है जिन्हें वो अपनी जवानी के दिनों में शायद नहीं ले सकते थे, हैरत हो सकती है लेकिन हमारे यहां की सामाजिक बनावट में लव शब्द मेरे बचपन तक बहुत आसानी से नहीं लिया जा सकता था लेकिन अब जब ये दीवारें टूटने लगी हैं तो मेरे पिता जैसी उम्र के लोग अपनी उम्र के लोगों से यह भी कह पा रहे हैं कि, ‘अच्छा आपके बच्चे को फलाने की बच्ची सेलवहो गया है ये उस समाज के लोगों के मुंह से निकला हुआ शब्द है जो अपनी लड़कियों को किसी से लव मैरिज कर लेने के बाद भी वापस ले आए औरइज्जतके नाम पर दूसरी शादी भी करवा दी, सबको पता भी चला लेकिन कोई बोला नहीं क्योंकि सबकीइज्जतेंइस तरह बच रही थीं। अब अच्छा लग रहा है कि लड़के या लड़की का पिता आकर कहता है, ‘फलाने अब का करें जमानौ बदलरौ , नईं करी तौ कछु कर बैठंगे’, बिना  शर्तों का प्यार शादियों में भी बदल रहा है।
ये अहम इसलिए भी है कि मेरे साथ पढ़ी कई लड़कियों को पढ़ाई छुड़वा कर से सिर्फ इसलिए घर बिठा लिया क्योंकि उसने कोई बॉयफ्रेंड बना लिया या वो किसी लड़के के साथ सिर्फ आइसक्रीम खाते हुए दिख गई थी।  
खैर! बहुत अच्छा लग रहा है हमारे आसपास कुछ तो बदल रहा है और ये बदलाव शहर ही नहीं गांवों में भी पहुंच रहा है। उम्मीद है इस शुरूआत का फैलाव बढ़ेगा, प्यार बढ़ेगा तभी समाज निखरेगा।